Wednesday, 11 May 2016

मेट्रो



...और उससे मेरी नज़रें मिली। मैं झेप गया। 

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मेट्रो मेरे जीवन का हिस्सा है। अगर मेट्रो नहीं होता तो शायद मैं अपने पसंदीदा राइटर की कहानियाँ नहीं पढ़ पाता और ना ही अपने हार्ड ड्राइव में रखीं फिल्में देख पाता। क्योंकि ऑफिस जाने में सवा घंटे लगते हैं- और दिन के ढाई से तीन घंटे मैं मेट्रो में ही बिताता हूँ, इसलिए मैं इसे अपना घर भी कह सकता हूँ। लेकिन मेट्रो को घर कहना अजीब लगता है। इसे जीवन का हिस्सा कहना ठीक रहेगा। 

जीवन इतना ख़ास नहीं है कि इसमें हर वक़्त एक कहानी खोज लूँ। लेकिन जब भी सुबह उठता हूँ तो एक कहानी की तलाश करने लगता हूँ। इसी कहानी को खोजते हुए मैं ब्रश करता हूँ। मैं ब्रश करीब दस-बारह मिनट तक करता हूँ। बारह मिनट में एक छोटा सपना देख लिया जा सकता है। जैसे कि मैं एक पहाड़ पर गया (ये सोचने में सिर्फ तीस सेकंड लगेंगे); पहाड़ के आसपास जंगल के बारे में सोचना (ये खूबसूरत हिस्सा है- ढाई मिनट लगेंगे); पहाड़ पर मुझे एक चिड़िया दिखी जो मुझे बुला रही है (एक मिनट); मैं उस चिड़िया से बातचीत करता हूँ, और इसी दौरान एक छोटी सी कविता भी लिखता हूँ (बातचीत और कविता में काफी वक़्त लगता है- चार मिनट लग जाएंगे); फिर चिड़िया मुस्कुराते हुए उड़ जाती है, और मैं धीरे-धीरे उस कहानी से वापस आ जाता हूँ- ब्रश करने (दो मिनट में सबकुछ ख़त्म करना ही पड़ेगा)। 

ब्रश करने के बाद नहाना, और पिछली रात को बाहर निकाले कपड़े पहनने के दौरान भी मैं कई कहानी बुनता रहता हूँ। कहानियों को बुनने में मुझे सबसे मुश्किल उनका अंत खोजने में लगता है। 

इन्ही सब के बीच मैं मेट्रो में बैठ चुका हूँ। मेट्रो में सीट मिलना एक बड़ी बात है- इसलिए जैसे ही सीट मिलती है मैं कुछ करने के प्रेशर में आ जाता हूँ। मतलब ये कि मेट्रो मैं बैठने कि इक्षा हर किसी की होती है, लेकिन हर कोई बैठ नहीं पाता। और अगर मुझे ये मौका मिला है तो मैं इसे यूँ ही नहीं खो सकता। ऐसे वक़्त के लिए मेरे पास एक किताब होती है, या मेरे मोबाइल में सेव की गयी फ़िल्म।

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आज मेट्रो में बैठने के बाद मैं एक पसंदीदा राइटर की किताब पढ़ रहा था। तभी उससे मेरी नज़र मिली, और मैं झेप गया। 

वो ठीक मेरे सामने बैठी थी। उसका नाम मुझे नहीं पता लेकिन अगर मुझे उसका कुछ नाम रखना होता तो मैं उसे स्वाति कहता- वो एक स्वाति जैसी लग रही थी। 

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मैं जिस स्कूल में पढता था वहाँ हर दूसरी लड़की का नाम स्वाति था। ये इतना खूबसूरत नाम था कि हर किसी ने अपने अपने घर में एक स्वाति को देखा हुआ था। मुझे कोई पुराना स्कूल का दोस्त मिल जाए तो हम हर किसी की बात करते हैं, लेकिन हमारे बातचीत के हिस्से में कोई स्वाति नहीं है, क्योंकि स्वाति बहुत सारी थीं। मुझे स्वाति नाम से कोई लड़की याद नहीं आती। 

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ये भी एक स्वाति जैसी थी। 

मैं पसंदीदा राइटर कि कहानी के दूसरे पन्ने पर पहुँचा ही था कि पेज बदलते हुए हमारी नज़र मिल गयी। वो अपनी एक दोस्त के साथ बातें कर रही थी। उसकी दोस्त एक श्रुति जैसी थी- हर स्वाति की एक श्रुति दोस्त होती है। 

मैंने स्वाति को दस सेकंड के लिए देखा होगा। और आठवें सेकंड में उसने मुझे उसे देखते हुए देख लिया। हमारी नज़रें मुश्किल से दो सेकंड के लिए मिली होंगी। दसवें सेकंड में मैं झेप गया। 

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मुझे नज़रें मिलने पर पहले झेंपने की आदत है। मैं बचपन में आँख लड़ाने वाला खेल भी ठीक से नहीं खेल पाता था। मुझे ऐसा लगता है कि लोगों को ज़्यादा देर तक देखो तो वो बुरा मान जायेंगे। क्यों बुरा मान जायेंगे, ये मुझे नहीं पता। लेकिन कई लोग बुरा मान जाते हैं, ये मैं जानता हूँ। लेकिन मुझे ऐसा भी लगता है कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुष ज़्यादा बुरा मानते हैं। स्कूल के दिनों में सीनियर लड़कों से इसलिए भी लड़ाई हो जाती थी कि हमने उन्हें कुछ देर के लिए लगातार देख लिया था। जब मैं भी सीनियर हुआ तो कोई जूनियर कुछ देर के लिए लगातार देखता तो मैं भी बुरा मान जाता और उसे जाकर पीट देता। 

स्कूल की लड़कियाँ कभी भी बुरा नहीं मानती। क्योंकि आजतक मैंने किसी लड़की को किसी लड़के को इसलिए पीटते नहीं देखा कि वो उसे देख रहा था। लेकिन ये भी हो सकता है कि लड़कियों को भी गुस्सा आता हो, और वो लड़ाई करना नहीं चाहती हों। मैं इस बात का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे सकता क्योंकि मैं पुरुष हूँ, और जीवन भर सिर्फ पुरुष ही रहा हूँ। मैं शिव की तरह अर्धनारी नहीं बन पाया। अगर ऐसा बनता तो मैं बहुत से सवालों का जवाब जान जाता। 

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मैं आँखें झेंपने के बाद सीधा किताब पढ़ने लगा। लेकिन अब किताब की कहानी से मेरा ध्यान हट चुका था। मुझे एक कहानी अपने आसपास दिखलायी दे रही थी, जिसका नायक मैं था- और नायिका स्वाति। जीवन के किसी भी हिस्से में नायक बनना मुझे सबसे अच्छा लगता है। नायक को लोग ध्यान से देखते हैं। नायक का दोस्त अच्छा लगता है, लेकिन उसे ध्यान से नहीं देखते। उसे नायक के दोस्त के रूप में ही जानते हैं। 

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मैं जब स्कूल में था एक नायक की तरह रहता था (ऐसा मैं सोचता हूँ, और मुझे ऐसा सोचना अच्छा लगता है)। मेरे कई दोस्तों को लोग सिर्फ इसलिए जानते थे क्योंकि वो मेरे दोस्त थे। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ मेरे आसपास नायक बढ़ गए। और धीरे-धीरे मुझे भी लोग किसी के दोस्त के रूप में जानने लगे। मैं ऐसे दोस्तों से दूरी बना कर ही रखता हूँ। 

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अभी स्वाति अपनी दोस्त से मेरे ही बारे में बात कर रही है। ये मैं जानता हूँ। क्योंकि श्रुति ने मुझे अचानक से देखा है। मैं फिर से झेप गया हूँ। उन दोनों के चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं है। इसलिए मैं कह नहीं सकता कि अभी मुझे नायक माना जा रहा है या खलनायक। 

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मुझे खलनायकों से भी कोई दिक्कत नहीं रही। खलनायक को भी लोग ध्यान से देखते हैं। लेकिन उसके बारे में अच्छा नहीं सोचते। 

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स्वाति और श्रुति के बात करने के तरीके में बदलाव भी आ चुका है। मेट्रो में भीड़ नहीं है। मैं स्वाति से बात भी कर सकता हूँ। 

तभी राजीव चौक मेट्रो आ गया। मुझे लगा स्वाति भी वहीँ उतरेगी। लेकिन वो अपना सामान नहीं समेट रही। स्वाति देखने से चांदनी चौक या दरियागंज की लग रही है। इसलिए वो यहाँ नहीं उतरेगी। वो मेरी तरफ़ देख भी नहीं रही। मैं धीरे-धीरे अपना सामान समेट रहा हूँ, और स्वाति को आँखों के किनारे से देख रहा हूँ। 

मैं बाहर निकलता हूँ। जैसे ही गेट बंद होता है, मैं स्वाति को देखता हूँ। वो एक बड़े मुस्कान के साथ मुझे देख रही होती है। श्रुति भी मुस्कुराते हुए स्वाति को देख रही होती है। 

मुझे एक नयी कहानी मिल गयी है। 

...और मैं मुस्कुराते हुए झेप जाता हूँ। 


11.5.2016

Friday, 11 March 2016

बैक्ग्राउंड म्यूज़िक



बहुत पहले जब बहुत सारे गाँव थे, तो एक अनाम गाँव भी था। छोटा सा। वहाँ सबकुछ अच्छा था।

उस गाँव में ख़ुशहाली थी। लोग मज़े में थे। सुबह उठते; दिन भर काम करते; शाम में परिवार और दोस्तों के साथ हँसते। सो जाते। फिर सुबह उठते; दिन भर काम करते- पसीना बहाते। परिवार और दोस्तों के साथ हँसते। और सो जाते। ना ज़्यादा कमाते थे, और ना ज़्यादा कमाना चाहते थे।

उसी गाँव में एक बाँसुरी वाला रहता था। वो कहाँ से आया - कहाँ का था - किसी को नहीं पता था। बस वो था। जब भी लोग काम करने जाते, वो सड़क किनारे कोई धुन छेड़ता। शाम में जब लोग लौटते तो वो किसी और धुन के साथ बातें कर रहा होता। लोग उसे देखते, मुस्कुराते और भूल जाते। जब लोग सड़क किनारे बातें कर रहे होते, बाँसुरी की कोई धुन आस-पास टहलती रहती। बाँसुरी वाला भी नहीं जानता था और गाँव वाले भी नहीं जानते थे - लेकिन अनजाने में वो उन सब की बातों का हिस्सा था। उसकी धुन गाँव वालों की बातों में घुल चुकी थी। दूसरे गाँव वाले कहते कि अनाम गाँव के लोग बहुत मीठी और सुरीली भाषा में बात करते हैं।

सब कुछ अच्छा था।

एक दिन गाँव के कुछ लोग आपस में बात कर रहे थे। बाँसुरी वाला रोज़ की तरह बाँसुरी बजा रहा था। दो लोगों में किसी बात पर कहा-सुनी हो गयी। बाँसुरी बजती रही। वो दो लोग लड़ पड़े। बाँसुरी बजती रही। पूरा गाँव लड़ाई में व्यस्त हो गया। दो गुट बन गए। बाँसुरी बजती रही।

तभी किसी आदमी ने चिल्ला कर कहा,"बंद करो ये बाँसुरी बजाना। कुछ काम नहीं है क्या!"

बाँसुरी वाला चुप हो गया। वो उस इंसान को देखता रहा। उसने देखा कि लड़ाई बढ़ चुकी है।अब कोई भी बाँसुरी की घुन में इंट्रेस्टेड नहीं था।

वो चुप ही रहा।

फिर बाँसुरी वाला कहीं चला गया। कोई उसे जानता नहीं था, तो किसी ने उसके जाने को नोटिस नहीं किया। लेकिन वो जा चुका था। हमेशा के लिए।

उसके बाद शामें वैसी नहीं रहीं। जो लोग शाम में सड़क किनारे गप्प मारते रहते थे, उन्हें अब बात करने में मज़ा नहीं आता था। लोगों की बातें अब बेसुरी हो चुकी थीं।

गाँव का बैकग्राउंड म्यूज़िक खो गया था।

8.3.2016

Monday, 2 February 2015

शहर का अकेलापन‬

-1-

सुबह की धूप और शाम के अँधेरे में फर्क ख़त्म होने लगा है। 
ऐसा ही कुछ सोच कर वो नयी सड़क के अनजान गलियों का सफ़र तय कर रहा था। 
"किधर जाना है?" रिक्शे वाले ने पूछा। 
"नई दिल्ली मेट्रो।"
"40 रुपया।"

वो चलने लगता है। उसे मालूम नहीं कि वो क्यों नयी सड़क गया था- या क्यों नयी दिल्ली जा रहा था। 
"किधर रहते हो?" रिक्शेवाले से पूछा। 
"यहीं- दरियागंज के पास।"
"दिन का कितना काम लेते हो?"
"300 से 400। कोई ठीक नहीं है। कभी ज़्यादा। कभी कम।"
"इस बार किसको वोट दोगे?"
"सोचा नहीं है।" रिक्शेवाला संभल का जवाब देता है।

"ठीक आदमी को वोट देना।"
"हाँ। दे देंगे।"

"यहीं उतार दो।"

एक बेमतलबी संवाद के बाद वो आगे बढ़ चला- कहीं और। उसे नहीं मालूम कि वो कहाँ जा रहा था। एक नशे की हालत में शहर के कोने-कोने भटक रहा था। 
अकेलापन एक नशा है। वो अकेलेपन से लड़ रहा था।

"सिगरेट देना।"
"कौन सी?"
"कोई भी।"

"किधर रहते हो?" दूकान वाले से पूछा। 
"लक्ष्मी नगर।"
"इतने दूर से रोज़ यहाँ आते हो?"
"हाँ।"

और भी लोग थे वहाँ। वो और बात नहीं कर सका। सिगरेट ख़त्म करके वो मेट्रो की तरफ बढ़ा- सोचते हुए कि उसे जाना किधर है।
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Tuesday, 14 January 2014

एक था राजा एक थी रानी


एक था राजा, एक थी रानी...
और इसके बाद हुई शुरू कहानी!

बात कई हज़ार साल पहले की है- तब जब कुछ भी ना था- ना मेट्रो, ना ट्रेन, ना बिजली, ना जहाज, ना देश! लेकिन समाज नया-नया बना था| समाज बनने से पहले सभी खुश थे, आराम से जी रहे थे, खा रहे थे, मौज में थे| समाज किसी ने बनाया नहीं था, वो खुद-ब-खुद बन गया था| कुछ तो ज़रूरत के कारण, और कुछ तो बस ऐसे ही! शौक था सभी को कि कुछ अलग होना चाहिए| भाषा नयी-नयी बनी थी| अब इंसान बातचीत करने लगे थे| सभी बहुत खुश थे| लोगों को खोज-खोज कर बातें करते| एक ही बात दुहराते, और खुश हो जाते| संगीत और कविता ने भी जन्म लिया| सभी को अब बहुत कुछ मिल गया था करने को|

एक इंसान था जो थोड़ा सा अलग था| क्योंकि समाज बनने की शुरूआती ज़रूरत नाम थी, उसका भी एक नाम था- सरछु| सरछु का रंग गेहुआं और कद काठी उस समय के औसत से थोड़ा ज्यादा| वो सोचता बहुत था| उसे ये बात मालूम चली थी कि समाज बनते ही लोग अचानक से बेवकूफ हो गए हैं| सभी ज़रूरत से ज्यादा अलग चीज़ें करना चाहते हैं| उसे ये सब बहुत फूहड़ लगने लगा| 

उन्ही दिनों कुछ लोगों ने मिलकर भगवान को खोजा था| वो सभी बेहद खोजी लोग थे| दिन भर अकेले बैठा करते और शाम तक कुछ ना कुछ खोज लेते| समाज वालों को आश्चर्य हुआ और कुछ भी समझ नहीं आया| जब दो-तीन लोगों ने खोजी प्रजाति से कहा कि उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है कि ये सब क्या है, तो खोजी प्रजाति ने समझाया कि इन बातों को समझना हर किसी के बस की बात नहीं है| बस वही समझ सकता है जो भगवान का करीबी हो| सरछु ने इस बारे में भी सोचा, और समझ गया कि ये एक नया गोरख धंधा है| वो सोचता बहुत था, बोलता बहुत कम|

बात तब की है जब सरछु सभी चीज़ों से- समाज से, भाषा से, भगवान से- तंग आकार दूर निकल पड़ा| सरछु अकेला ही नदी को पार करके एक खोज पर निकल पड़ा| उसकी खोज क्या थी, वो भी नहीं जानता था| बस जानता था कि सभी चीज़ों से दूर जाकर उसे कुछ ना कुछ मिल जाएगा| वो चलता गया, चलता गया, चलता गया...

और एक दिन वो थक गया| उसे पता भी नहीं चला कि वो कितने दिनों से चल रहा है| पानी में देखा तो उसके बाल सफ़ेद हो गए थे| जब अंतिम बार देखा था तो वो काले थे| इस बात से उसने अंदाजा लगाया कि वो कई दिनों से चल रहा है| अब जब वो थक चुका था उसे कुछ समझ नहीं आया कि वो क्या करे| वो बैठा-बैठा सोचने लगा| कई दिनों में पहली बार उसे अपने समाज की याद आई| उसे वहाँ के बेवकूफ लेकिन बहुत ही मासूम लोग याद आने लगे| उसे अपना घर भी याद आने लगा| उसे सब कुछ इतना ज्यादा याद आने लगा कि वो रोने लगा| वो अपने जीवन में पहली बार कुछ भी याद करके रोया था| वो समझ गया कि समाज उसके अंदर बस गया है और वो समाज से दूर नहीं रह सकता| क्योंकि भाषा उसे आती थी, शब्द उसने सीख लिए थे, उसे इंसानों से बात करनी थी| वो वापस लौट चला| वो चलता गया, चलता गया, चलता गया...

और एक दिन वापस अपने समाज में पहुँच गया| अब उसे कुछ भी अजीब नहीं लगा रहा था| सबकुछ अच्छा लगने लगा| लेकिन कोई उसे पहचानता नहीं था| उसने लोगों को बताया कि वो सरछु है| किसी को याद ही नहीं आया कि सरछु कौन था| खैर लोगों ने उसे बोला कि अब आ गए हो तो यहीं रहो| 

लेकिन सरछु अब सिर्फ सोचता नहीं था| उसे अब कुछ करना भी था| वो खोजी लोगों को खोजने लगा| उसे पता था कि खोजी बहुत ही काम के हैं| असल में खोजी लोग ही थे जो समाज को चला रहे थे और अपना भरण-पोषण कर रहे थे| सरछु ने एक खोजी से मुलाक़ात की और कहा कि वो कुछ ऐसा करना चाहता है जिससे समाज का आकार और विस्तार बदल जाएगा| खोजी को पहले तो लगा कि सरछु खोजी और खोजी समुदाय के लिए खतरा हो सकता है| लेकिन जब सरछु ने पूरी बात बताई तो खोजी बहुत खुश हुआ| वो सरछु का मुरीद हो चुका था| 

अगले दिन खोजी एक ढिंढोरा लेकर समाज में निकला| वो ढिंढोरा पीट-पीट कर लोगों को एक जगह जमा करने लगा| सभी लोग आश्चर्य में इकट्ठा होने लगे| जब समाज के सभी लोग इकट्ठा हो गए थे, तब खोजी ने बोलना शुरू किया, “आप सभी लोगों को बताना चाहूँगा कि कल रात मेरी बात भगवान से हुई, और उन्होंने मुझे आप सभी लोगों को ये बतलाने को कहा कि इस समाज का एक मुखिया भी होना चाहिए| मुखिया की ज़रूरत इसलिए है कि बाहर एक और समाज बन रहा है, और वहाँ के लोग बहुत खराब हैं- आप सभी की तरह अच्छे नहीं हैं| वो आपको मार भी सकते हैं| भगवान ने कहा है कि सरछु, जो हम सभी में से इकलौता इंसान है जो समाज के बाहर भी गया है, वही हम सभी का मुखिया होगा| और अब से ये राजा कहलायेगा| इस राजा के लिए रानी भी चाहिए होगी| तुम.... हाँ तुम इधर आओ!” खोजी भीड़ में खड़ी एक नवयुवती को बुलाने लगा| नवयुवती डरी-सहमी खोजी के पास गयी| खोजी ने फिर से कहना शुरू किया, “ये लड़की आज से हमारे समाज की रानी होगी|”
राजा रवि वर्मा की पेंटिंग "राजा-रानी"
सभी लोग बहुत खुश हुए| ये उनके लिए बिल्कुल ही नया अनुभव था| राजा और रानी शब्द उन्होंने पहली बार सुना था| वो सभी इतने खुश हुए कि पागल हो गए| सरछु अब उनका राजा था| नवयुवती उनकी रानी...

और दुनिया को पहला राजा और पहली रानी मिल गए|

एक था राजा, एक थी रानी...
और इसके बाद हुई शुरू कहानी!

-14.1.14

Thursday, 20 June 2013

उलटी


पहाड़ों से घिरे घरोंदें में रहना, चिड़िये की तरह चहकना, ताज़ा हवा में पंख खोल के उड़ना- ये सब वो करना चाहता था| लेकिन लोग इसे रोमांटिसिज़्म कहते थे| तो वो चुपचाप ट्रेन की टिकट कटा कर नैनीताल के पास किसी गाँव में जाकर रह लेता था- कभी कैंप में या फिर कभी किसी सस्ते होटल में| लोग पूछते कहाँ जा रहे हो तो कहता “वेकेशन पर जा रहा हूँ”- अब कहाँ बताता फिरे कि मौका मिला है, चिड़िया बनने जा रहा हूँ|

लेकिन पहाड़ों पर जाना इतना आसान नहीं था| पहले तो शहर के भागदौड़ से छुट्टी लेना, फिर पैसे जोड़ कर टिकट कराना, फिर पता करना कि रहने का इंतज़ाम क्या होगा- इंतज़ाम ना भी हो तो भी चला जाता क्योंकि उसे हद की बेहदी तक विश्वास था कि इंसान किसी भी हालात में सर्वाइव कर सकता था| पैसे भी किसी न किसी तरह जोड़-जार लेता| क्योंकि कुछ खास काम नहीं करता था तो छुट्टी लेना कोई बड़ी बात नहीं थी| 

सिर्फ और सिर्फ दिक्कत जो थी वो थी पहाड़ों पर चढ़ाई करते वक्त उलटी आना! ये बहुत बड़ी दिक्कत थी- इतनी बड़ी कि ये कहानी लिखनी पड़ी! 



पहले-पहल तो उसे बहुत दिक्कत मालूम हुआ| उसने ठान लिया कि अब चाहे खुदा का बच्चा भी उसे बुलाये या खुद खुदा ही पहाड़ों पर टैक्सी चलाये- वो दुबारा किसी पहाड़ पर नहीं जायेगा| लेकिन पहाड़ कुछ खास होते हैं, ये समझने में उसे कुछ ज्यादा समय नहीं लगा| उसने किसी ज्योतिष के माफिक अपने आपको ये फैसला सुनाया कि पहाड़ों पर जाते रहने से उसके रूह को कुछ ऐसा मिलेगा जो शहर में मौजूद नहीं है| वो क्या है जिसके लिए उसे पहाड़ों के चक्कर लगाना था वो नहीं जनता था| 

इसके बाद भी मुद्दे कि बात नहीं बदलती| उलटी| 

उलटी एक खास प्रकार की क्रिया है जिसके ऊपर इंसानी ताकतों का वश नहीं होता| इसे जब आना होता है तो आता है| मन बेचैन सा हो जाता है| और सबसे बड़ी बात आपने जो कुछ भी खाया हो- भले ही बहुत ही महँगा और हाइजेनिक- वो अनपचा खाना बाहर निकल आता है! आप चाह कर भी उसे रोक नहीं सकते| जब वो खाना जो आपने बड़े चाव से किसी खास इंसान के साथ खाया था, आपके मुँह से निकल रहा हो तो आप बस उन सुनहरी यादों को याद कर सकते हैं, दुबारा उस स्वाद का आनंद नहीं ले सकते| 

उसके साथ एक और दिक्कत थी कि उलटी के बाद उसे- हर किसी की तरह- कमजोरी का एहसास होता| तबियत नासाज़ हो जाती और पहाड़ों पर चिड़िया बनने कि चाहत खत्म होने लगती| ये शुरूआती दिनों कि बात थी| उसके बाद वो बीसीयों बार अलग- अलग पहाड़ों पर गया लेकिन हर बार उसे मुनासिब मात्रा में उलटी होती| परेशानी कि हद तक होती| अलबत्ता, बेहद तक होती| 

इसके बावजूद वो पहाड़ों पर जाता- जब मौका मिलता शहर की धमाचौकड़ी से एस्केप कर जाता| दर असल वो एक एस्केपिस्ट था| लेकिन मुआ उलटी उसका पीछा नहीं छोड़ती| कुछ लोगों ने उसे सलाह दी “फलां-फलां दवाई खा लिया कर| उलटी नहीं होगी|” उसको समझ नहीं आता ये कैसे मुमकिन है| अगर मुझे मोशन सिकनेस की दिक्कत है और मोशन भी हो रहा है तो कोई दावा इसका इलाज कैसे कर सकती है? उसे इतना मालूम था कि उसका शरीर उससे ज्यादा समझदार है| शरीर को मालूम था किस वक्त कैसे रिअक्ट करना है| अगर शरीर किसी भी कारण से कुछ चीज़ बाहर निकालना चाहता है, और वो उसे किसी तरीके से रोके, तो ये तो प्राकृतिक नहीं है| कुछ और मुआमलों में कॉन्सटिपेशन की दिक्कत भी हो जाती थी| ये कुछ दूसरा मामला था, लेकिन दिक्कत तो यहाँ भी बराबर हो सकती है!

उसने किसी भी तरह के फलां-फलां दवाई खाने से इनकार कर दिया| लेकिन लोगों को ये बात पसंद नहीं आई| हर मर्तबा जब वो उलटी करता तो लोग उसे ताने मारते “मत खाओ फलां-फलां दवाई| और करो उलटी|”

इस बीच एक खासा वक्त गुज़र गया| पहाड़ों का जाना भी कम नहीं हुआ और ना ही उलटी का आना| लेकिन कुछ ऐसा हुआ जो खास था| उसे धीरे-धीरे उलटी करने में आनंद आने लगा| 

मुँह में नमकीन स्वाद का आना, पेट में एक भीनी दर्द का एहसास होना, सर का शुन्य में चले जाना- ये सब अब सफर का हिस्सा बन चुके थे| टैक्सी से सर बाहर निकाल कर अपने मुँह से अपने पसंदीदा खाने को बाहर जाते देखना एक अद्भुत एहसास था- पूर्ण रूपेण मेडीटेशन| उसे (फिर से) हद की बेहदी तक विश्वास हो गया था कि ये कुछ खास है जिसके बारे में कोई बात नहीं करता| सबसे खास एहसास होता था जब उलटी आती थी और उसका पेट खाली होता था- सिर्फ पानी के अलग अलग रूप बाहर निकलते थे जो उसके दाँतों को खट्टा कर जाते| उसे अपने खट्टे दाँतों को आपस में रगड़ना बहुत अच्छा लगने लगा| वो अब बहाने खोजने लगा उलटी करने के, जिसके कारण पहाड़ों के चक्कर बढ़ गए, और लोगों के ताने भी|

वक्त आ गया था जब लोगों के ताने और उलटी की चाहत के बीच युद्ध शुरू हो चुके थे| उससे लोग पूछते कि फलां-फलां दवा क्यों नहीं ले लेता, तो उसके पास कोई जवाब नहीं होता| अब किसे समझाने बैठे कि उलटी करना उसे अच्छा लगता है| ये एक बेतुका सा जवाब मालूम होता जिसे लोग मसखरी समझते| लेकिन वो मसखरा नहीं था| उसे मसखरी बिल्कुल भी नहीं आती थी| 

ये वो वक्त था जब वो लगातार कई महीनों तक पहाड़ों के चक्कर लगाता रहा| अलग अलग लोग उसके साथ अलग अलग जगह जाते थे| कुछ नए, कुछ पुराने- दोस्त बन जाते थे| जो भी उसे उलटी करता देखता कहता कि इतनी तकलीफ क्यों ले रहे हो, फलां-फलां दवाई क्यों नहीं खा लेते? वो जवाब नहीं दे पाता| लेकिन कुछ लोग इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने ने उसे बहुत खरी-खोटी सुना डाली| उनका कहना साफ़ था “तुम्हारी वजह से हमारी गाड़ी गन्दी हो जाती है| तुम्हारी वजह से हमारा वक्त खोटा होता है| तुम कोई तीस मार खान हो क्या जो फलां-फलां दवाई नहीं खाओगे! तुम्हे ये दवाई खानी ही होगी!”

मामला संजीदा हो चला था| उसे पहाड़ों से ज्यादा उलटी से प्यार हो गया था| वो अब किसी कि सुनना नहीं चाहता था| लेकिन उलटी करने के लिए उसे टैक्सी पर चढ़ना होता था| लेकिन अब उसे कोई भी अपने साथ ले जाने को तैयार नहीं था| बात बढ़ती चली| उसका दिल बैठता चला|



एक दिन उसे एक इंसान ने फलां-फलां दवाई दी और कहा, “सोचो मत| हर कोई ये दवा खाता है| मैं, वो, और वो| तुम्हारे पिता, तुम्हारी माँ, तुम्हारे मौसा और मामा भी- हर कोई| तुम भी खा लो और हमारी तरह आराम से जियो|”

उस दिन उसने फलां-फलां दावा खा ली| आज भी खाता है| सब कहते हैं वो बहुत आराम से सफर करता है, उसे कोई दिक्कत नहीं होती| 


4.6.13

Saturday, 29 December 2012

लूडो


“आप चलिए| अब आपका चांस है|”

“हाँ पता है| रुकिए, हम जरा चाय चढ़ा कर आते हैं| तब तक आप गोटी इधर-उधर मत कर दीजियेगा| हम सब देख रहे हैं|” 

और गोमती चाय चढ़ाने किचन में चली गयीं| सिन्हा जी ने जैसे ही देखा की गोमती जी किचन में गयीं, उन्होंने अपनी दो लाल गोटियों को कुछ कदम आगे बढ़ाया, कुछ पोजीशन बदला ताकि गोमती जी की पीली गोटियाँ उन्हें काट ना सके| पीली गोटियों को भी थोड़ा सा कंविनिएंट पोजीशन में रख दिया| अब खेल वो जीत रहे थे| फिर वो अखबार पढ़ने लगे ताकि गोमती जी को कोई शक ना हो सके| 

ये सिलसिला कई सालों से चल रहा है| सिन्हा जी को रिटायर हुए सात साल हो गए हैं| वो बिहार सरकार के बिजली विभाग में हेड क्लर्क हो कर रिटायर हुए थे| सीधे सादे व्यक्तित्व वाले इंसान थे| करियर में कभी किसी ऐसे चक्कर में नहीं पड़े जिसके कारण उन्हें शर्मिंदा होना पड़ा हो| वही सब कुछ करते थे जो उनके दफ्तर के बाकि सभी साथी करते रहे| स्वभाव के चिडचिडे नहीं थे| सुगर की दिक्कत थी उन्हें, फिर भी चाय में चीनी डलवा लेते थे| गोमती उन्हें कभी चीनी वाली चाय नहीं देती थी, तो वो सिर्फ दफ्तर में ही ये शौक पूरा कर पाते थे| जबसे रिटायर हुए, ये शौक भी जाता रहा| और सात सालों में बिना चीनी वाली चाय की आदत हो गयी है| 

“लीजिए|” गोमती ने चाय पकड़ाते हुए कहा| “फिर से बदमाशी कर दिए| गोटी सब ठीक कीजिये| हमको सब याद है कौन गोटी कहाँ पर था|” और सिन्हा जी मुस्कुराने लगे| 

“तो तुम्ही जीतोगी हमेशा? हमको भी जीतने दो|” 

“तो जीतिए| मना कौन किये हुए है| लेकिन गलथेतरई मत कीजिये| हम जीतने लगे तो पूरा खेल बिगाड़ दीजियेगा| खुद से चाय काहे नहीं बनाते हैं|” 

“अच्छा| चलो ना भाई, तुम्हारा चांस है|” 

“पहले गोटी ठीक कीजिये|” 

सिन्हा जी को कभी भी लूडो खेलना अच्छा नहीं लगता था| जबकि गोमती लूडो खेलना पसंद करती थीं| जब सिन्हा जी ऑफिस जाते थे तब वो घर में काम करने वाली दाई के साथ बैठ कर खूब लूडो खेलती थीं| बच्चे पढ़ाई करने के लिए दिल्ली में रहते थे| छुट्टियों में आते तो माँ का पूरा दिन बच्चों की देखरेख में गुज़र जाता| स्वाति और अविनाश लूडो खेलने को समय की बर्बादी समझते थे, तो उनके आते ही गोमती जी का लूडो खेलना बंद| उन्हें भी ध्यान नहीं रहता था, और बाकी सब काम में वक्त कट जाता था| 

अब बच्चे बड़े हो गए हैं| शादी हो गयी है दोनों की| अविनाश दिल्ली में ही रहने लगा है, और स्वाति बेगुसराय में| बेगुसराय पटना से बहुत दूर नहीं है, तो महीने दो महीने में सिन्हा जी और गोमती से आकर मिल लेती है अपने बच्चों के साथ| अविनाश का आना थोड़ा कम होता है| जब कभी कोई पर्व-त्यौहार हुआ, वो भी अपने परिवार के साथ आ जाता है| बस पर्व-त्यौहार ही हैं जब सम्पूर्ण परिवार का मिलन होता है| बाकी वक्त घर में सिन्हा जी, गोमती और लूडो| 

रिटायरमेंट के बाद घर में बैठे-बैठे सिन्हा जी को बोरियत होने लगी थी| आदत थी सुबह उठने की, वो तो जाने से रही| घर के काम-काज में गोमती का हाथ बटाने लगे तो दाई को हटा दिया गया| कुछ पैसे भी बचने लगे और दम्पति के लिए कुछ काम निकल आया अपने आपको व्यस्त रखने के लिए| टीवी भी खराब होने लगी थी| जब नौकरीशुदा थे तब ही खरीदा था| अब टीवी में ना तो रंग साफ़ पता चलते ना ही आवाज़ ही ठीक से आती| अच्छा खासा हीरो भी गूँगा और बदसूरत नज़र आता था उन्हें| टीवी खरीदने की इक्षा तो कई बार हुई, लेकिन सिन्हा जी के पास कोई बचत राशि थी नहीं तो गोमती ने कभी बोला नहीं| जो भी कुछ पेंशन आता उससे घर का किराया, राशन और दवा का ही इंतज़ाम हो पाता था| थोड़ा बहुत जो बचता उसे गोमती जमा कर देती थी अपने गुल्लक में| कहती बुरे वक्त में काम आएगा| सिन्हा जी हमेशा मुस्कुरा देते| 

रिटायरमेंट के साल भर बाद ही गोमती को लूडो खेलने की सूझी| घर में बैठे-बैठे क्या करते, तो सिन्हा जी भी खेलने लगे| शुरुआत में बड़े जल्दी ऊब जाते थे| कहते ये क्या तरीका है वक्त काटने का| “आप यही सब करती थी जब हम ऑफिस में रहते थे?” गोमती शरमाते हुए मुस्कुराती| वो मुस्कराहट एक पाँच साल के अबोध बच्चे सी थी| सिन्हा जी ने ऐसी मुस्कराहट कभी देखी नहीं थी गोमती के चेहरे पर| बस लूडो का सिलसिला शुरू हो गया| 

पहले-पहल तो दिन में कोई तीन-चार बार लूडो खेलते दोनों| सुबह के चाय के साथ, दोपहर के वक्त सोने से पहले, शाम में नाश्ते के साथ और फिर रात में अगर इक्षा हुई तो| फिर धीरे-धीरे ये दिनचर्या का हिस्सा हो गया| जब मौका मिलता दोनों लूडो खेल लेते| 

सिन्हा जी ने गोमती के बारे में वो सब जाना जो वो पहले कभी जान नहीं सके थे| चालीस साल की शादीशुदा जिंदगी में कितने ही पल साथ बिताए थे, लेकिन उन्हें ये कभी पता नहीं चला था कि जब गोमती की पीली गोटी सिन्हा जी की लाल गोटी को काटती है तो वो गोमती के लिए अदभुत पल होता है| कितनी ही बार गोमती ने लाल गोटी काटते ही ठहाके मारे हैं, और कितनी ही बार खुशी से नाच पड़ी हैं| ऐसा प्रतीत होता जैसे सिर्फ एक गोटी काटने से गोमती अपनी हर दबी इक्षाओं को बहार निकाल देती| बहुत कुछ था जो वो सिन्हा जी से नहीं कह सकी थीं| जब पीली गोटी लाल गोटी को काटती, तो हौले से लाल गोटी के कान में सालों से बेजुबान लम्हों को बयां कर देती| वो कहती कि जब शादी के तीन साल हो चुके थे तो वो कितना चाहती थीं सिन्हा जी के साथ आगरा जाना जब वो अपने दोस्तों के साथ जा रहे थे| सिन्हा जी ने बस एक बार ही उनसे पूछा था, वो भी अनमने मन से| और जब उनकी ननद उनको ताने मारती, वो चाहती थीं कि सिन्हा जी अपनी बहन से झगडा करें| झगडा ना भी तो कम से कम गोमती का पक्ष रखें| लेकिन सिन्हा जी अपनी बड़ी बहन के सामने हमेशा मुस्कुरा कर रह जाते| 

सिन्हा जी को गोटी काटने में वो खुशी नहीं मिलती जो उन्हें गोमती के खुश चेहरे को देख कर मिलती है| इंसान कितना अजीब है, वो सोचते| कितनी बड़ी-बड़ी खुशियों की हम उम्मीद करते हैं| वो आती भी हैं, लेकिन कई बार बड़ी खुशियाँ खुशी नहीं देती| वो पल उनको सँभालने में ही निकल जाता है| और लूडो में गोटी काट कर जो खुशी मिलती है, वो कितनी सहज है, कितनी सरल है, अनमोल है, अदभुत है| उनकी गोटी कटती तो वो नाराज़ भी होते| लेकिन वो नाराज़गी कितनी ही खुशियों पर भारी पड़ती| सालों बाद वो खुद को मासूम महसूस कर रहे थे| 

“भक्! फिर आप जीत गयीं| हम समझ रहे हैं आप पासा में कुछ कर देती हैं| बार-बार छक्का कईसे आ जाता है जी?” 

“हाँ| हम जीत जाते हैं तो दुनिया भर का इल्जाम लगा दीजिए| हम कभी गाल नहीं बतियाते हैं| आप गोटी इधर-उधर करते हैं तो भगवान जी सजा देते हैं, और नहीं तो का!” 

“चलिए, एक ठो और गेम खेलते हैं| इ बार एकदम से हरा देंगे आपको|” 

“हाँ, देखते हैं...” कहते-कहते गोमती खाँसने लगी| 

“अरे, दवाई फिर नहीं ली| रुकिए, दवाई लाते हैं| इतना लापरवाह कईसे हो सकती हैं जी?” कहते हुए सिन्हा जी दवाई लेने चले गए| सिन्हा जी थोड़े आलसी किस्म के सरकारी मुलाजिम रहे थे| लेकिन उनका सारा आलसपन गोमती की एक खाँसी में उड़नछु हो जाता, और वो दौड़ जाते उनकी दवाई लेने के लिए| और गोमती खाँसते हुए कहती, “ रुकिए ना, हम ले रहे हैं ना दवा तुरंत| अपना चांस चलिए|” 

“पगला गयी हो एकदम्मे|” कहते हुए सिन्हा जी गोमती को दवा देते| ये सब एक रिवाज़ की तरह कई महीनों से, कई सालों से चल रहा है| 

समय के साथ-साथ दोनों की सेहत भी बिगड़ती जा रही है| लेकिन लूडो उसी उत्साह और जोश के साथ खेलते दोनों| अब ऐसा होता कि हर वक्त लूडो के बोर्ड पर गोटियाँ बिछी होती| सुबह उठकर पहला काम यही होता कि लाल और पीली गोटियों के बीच रेस लगाई जाए| एक मैराथन है जो कई सालों से दोनों खेल रहे हैं| 

सुबह का वक्त है| सिन्हा जी हमेशा गोमती के उठने के बाद ही उठते हैं| गोमती उन्हें दो बातें सुना कर उठाती हैं| आज गोमती ने उन्हें नहीं उठाया| सिन्हा जी ने देखा तो गोमती अब तक सो रही थीं| आठ बज चुके हैं| अब तक तो चाय और लूडो के दो गेम हो चुके होते| सिन्हा जी ने गोमती के बदन को छुआ तो वो जकड़ा हुआ और ठंडा पड़ा था| सिन्हा जी सन्न रह गए| 

अविनाश और स्वाति को फोन करके सबकुछ बताया| 

धीमे क़दमों से जब बैठक में पहुचें तो लूडो के बोर्ड पर लाल और पीली गोटियाँ बिछी देखीं| बोल पड़े, “सुनिए ना, आज आप पहले चांस लीजिए| हम गलथेतरई नहीं करेंगे|” 


29.12.12

www.shabdankan.com पर जून २०, २०१३ को प्रकाशित हुआ| 
लिंक: http://www.shabdankan.com/2013/06/nihal.html

Thursday, 1 November 2012

किरदार


वो कॉलेज में पढ़ता है| उसे नाटक खेलना अच्छा लगता है| कॉलेज के सभी दोस्त उसे नाटकवाला या ड्रामेबाज़ कह कर बुलाते हैं| ऐसा नहीं है कि वो सिर्फ नाटक ही खेलता है| उसे सबसे अच्छा काम गाना लिखना लगता है| लेकिन अभी तक उसने कोई गाना लिखा नहीं है| लिखा है, लेकिन सिर्फ एक- जो किसी ने गाया नहीं है| उसे मालूम है कि वो गाना लिखेगा| तब तक वो नाटक खेलना चाहता है| 

वो फिलहाल कॉलेज के ड्रामा सोसाइटी का प्रेसिडेंट है| इसके मुताबित वो अपने कॉलेज का सबसे अच्छा एक्टर है| कॉलेज में कुछ ढाई हज़ार स्टुडेंट्स पढ़ते हैं| उन सब में वो सबसे अच्छा है- ऐसी गलतफहमी उसे नहीं है| उसे मालूम है कि वो सिर्फ एक तरह का अभिनय कर सकता है| वो मंच पर सिर्फ ऐसे किरदार निभा सकता है जो वो असल जिंदगी में निभा रहा है| वो मंच पर बहुत तेज़ हँस नहीं सकता| वो किसी के भी सामने बहुत तेज़ हँसते वक्त असहज हो जाता है| ऐसा नहीं है कि वो बहुत तेज़ हँसना नहीं चाहता| वो चाहता है| जब वो अपने घर में अकेला रहता है तो बहुत ज़ोर से हँसने की कोशिश भी करता है, लेकिन फिर भी नहीं हँस पाता| फिर वो अपने आपको आईने में देखता है, और रोने की कोशिश भी करता है| वो बहुत अच्छा रो भी नहीं पाता| लेकिन नकली हँसी से बेहतर नकली रो लेता है| उसके रोने और हँसने के बीच बहुत अंतर नहीं होता क्योंकि वो दोनों नकली हैं| इसलिए वो अपने आपको बहुत अच्छा अभिनेता नहीं मानता| 

उसके दोस्त उसे अच्छा एक्टर मानते हैं| उनलोगों ने कभी भी नाटक नहीं देखा| दूसरे का भी नहीं देखा, और इसका भी नहीं देखा| लेकिन उन्हें लगता है कि ये अच्छा एक्टर है क्योंकि ये दिन भर कॉलेज में एक्टिंग करता है; अपने जूनियर्स को एक्टिंग सिखाता है; सीरियस रहता है| हमेशा सीरियस नहीं रहता- मज़ाक भी करता है| लेकिन उसके मज़ाक का कोई मतलब नहीं होता| उसके जोक्स पर ज़्यादा लोग हँसते नहीं हैं| जब भी वो कोई जोक सुनाता है तो सोचता है कि लोग कैसे हँसेंगे; कब हँसेंगे? वो लोगों को हँसाना चाहता है, क्योंकि वो भी दूसरों के जोक्स पर हँसता है| लेकिन जब कोई नहीं हँसता तो उसे लगता है कि उसपर उधार चढ़ गया| उसे उधार चुकाने की जल्दी है| इसलिए उसके जोक्स बहुत सीरियस किस्म के होते हैं- वो कई तरह के इमोसंस को मिक्स कर देता है अपने जोक्स में| हर मर्तबा जब वो जोक सुना चुका होता है तो शर्मिंदा हो जाता है| 

उसे मालूम है कि कॉलेज का ड्रामा प्रेसिडेंट बनना कोई बड़ी बात नहीं थी| उससे अच्छे एक्टर भी ड्रामा टीम में थे| उसे सिर्फ इसलिए ड्रामा प्रेसिडेंट बनाया गया क्योंकि वो रेस्पोंसिबिलिटी लेना चाहता है| उसने एक फ्रेंच नाटक का हिंदी रूपांतरण भी खोजा, जिसे उसने अडाप्ट किया| एक महीने तक वो नाटक अडाप्ट करता रहा| उसने फ्रेंच नाटक को पश्चिम दिल्ली के एक परिवार से मिला दिया| उसे किरदारों को जन्म देना अच्छा लगता है| किरदारों से खेलते वक्त वो अपने आपको बहुत बड़ा महसूस करता है| उसे मालूम है कि वो अच्छा नाटक लिख सकता है| कहानी भी अच्छी लिख सकता है| लेकिन उसे लगता है कि अच्छी कहानी आने में कुछ दिन और लगेंगे| अच्छी कहानी लिखने के लिए उसे अच्छी कहानियाँ पढ़नी होंगी| वो हर वक्त पढ़ने की कोशिश करता रहता है| 

वो अपना नाटक (जो की उसका नहीं है क्योंकि उसने बस अडाप्ट किया है) लेकर ड्रामा टीम के पास जाता है| सभी मिलकर नाटक पढ़ते हैं| जब तक रीडिंग चल रही होती है उसे डर लगता रहता है कि लोग उसके नाटक को नकार देंगे| लेकिन वो उसका नाटक नहीं है- फिर भी उस नाटक के साथ उसका एक रिश्ता बन चुका है| उसके किरदार उसने जन्मे हैं; वो फ्रेंच नहीं हैं| वो बिल्कुल वैसे ही हैं जैसा उसने दिल्ली में रहते हुए देखा है| वो डी.टी.सी बस में सफ़र करने वाले किरदार हैं| वो भिन्डी और टिंडे की सब्जी पसंद करते हैं| उनका पेरिस के किसी भी मोहल्ले से कोई रिश्ता नहीं है| वो अपने किरदारों को लेकर पोसेसिव है| अगर उसके ड्रामा टीम वालों ने उन किरदारों को नहीं पहचाना तो क्या होगा? 

लेकिन उसके ड्रामा टीम वाले उन किरदारों को पहचान लेते हैं| अब सभी मिलकर कहानी डिस्कस कर रहे हैं| कहानी से उसका बहुत वास्ता नहीं है| हर किरदार के पास हज़ारों कहानियाँ होती हैं| ये कहानी किसी और की है| अब उसे डर नहीं लगता| लेकिन हर किसी को कहानी अच्छी लगती है, किरदार भी अच्छे लगते हैं| अब ये नाटक साल भर खेला जाएगा; विश्वविद्यालय के हर ड्रामा कोम्पेटिशन में जाएगा| उसके किरदार अभी कुछ दिन जिंदा रहेंगे| वो खुश है| लेकिन बहुत खुश भी नहीं है| क्योंकि उसके किरदार अब उसके नहीं रहेंगे| ड्रामा टीम वाले मिलकर सभी किरदारों को ‘निभाएंगे’| 

वो घर लौट रहा है| आज का दिन अच्छा गुज़रा| घर पर कोई नहीं है| वो शहर में अकेले रहता है| उसे नहीं मालूम घर पर क्या करना है| वो घर पहुँचता है| उसे अकेलापन महसूस होता है| उसे आज कुछ काम नहीं है| वो घर से बाहर निकलता है| वो बगल के एक पार्क में जाकर बैठता है| वो इस पार्क में कभी-कभार ही आता है| उसे पार्क में आना बहुत अच्छा नहीं लगता| पार्क में आने से ठीक पहले उसे अच्छा लगता है कि वो पार्क में जा रहा है, लेकिन पार्क में जाते ही उसे पार्क से बाहर निकलने का मन करता है| ऐसा उसके साथ हमेशा होता है- घर, कॉलेज, ड्रामा रिहर्सल, सिनेमा- वो कहीं भी जाने के बाद वहाँ रहना नहीं चाहता| फिर भी कुछ देर रहता है| 

अब शाम हो चुकी है| 

उसका कोई दोस्त ऐसा नहीं है जो उसे शाम के वक्त मिले| उसे नहीं पता आज वो क्या करेगा| अब वो नाटक भी अडाप्ट नहीं कर रहा| उसके पास कोई किरदार नहीं हैं खेलने के लिए| वो यही सोच रहा है| 

अचानक उसका रायटर अपनी कॉपी बंद करता है| वो वहीँ पार्क के बेंच पर बैठा रह जाता है|



30.10.12