Thursday, 12 July 2018

एक प्रेम कहानी



सुनो,

मेरी आँखें सच में कभी बंद हो जाएंगी। और फिर कभी नहीं खुलेंगी। मैं मरूँगा। अपने अंतिम क्षणों में मेरा पश्चाताप क्या होगा? इस सवाल को हमेशा तो नहीं सोचता, लेकिन कभी-कभी ज़रूर सोचता हूँ।

मैं अपने बहुत सारे इक्कठा किये गए किताबों को नहीं पढ़ सकने का दुःख मनाऊँगा। मैं अपने हार्ड-ड्राइव में अनदेखे फिल्मों को नहीं देखने का शोक मनाऊँगा। मैं ठीक से प्रेम नहीं कर पाया, इस बात से दुखी रहूँगा। मैं कुछ लोगों से बहुत कुछ कहना चाहता था। उनसे ना कह पाने का दुःख रहेगा। मैं सबसे पहले एक क्रिकेटर बनना चाहता था। फिर पत्रकार। बीच में टेबल-टेनिस प्लेयर भी। लेकिन कुछ भी पूरा नहीं चाहता था। अभी भी जो भी चाहता हूँ उसे पूरा नहीं चाहता। मैं घर से जब भी निकलता हूँ पूरा नहीं निकलता। मेरा कुछ हिस्सा घर में रह जाता है। जब कोई रिश्ता ख़त्म होता है, तो मेरा कुछ हिस्सा किसी के पास छूट जाता है। मरते वक़्त ये दुःख भी हो सकता है कि मैं पूरा नहीं मरा। मेरे बहुत हिस्से बहुत लोगों के पास ज़िंदा रह जाएंगे। लेकिन इस बात से खुश भी हो सकता हूँ कि मेरे मरने के बाद लोग कुछ दिन तक मुझे याद रखेंगे। फिर वो भूल जाएंगे, जैसे मैं बहुत लोगों को भूल चुका हूँ। भूलना ज़रूरी है, वरना सर-दर्द बहुत बढ़ जाएगा।

मुझे सुसाइड नहीं करना। लेकिन मुझे सुसाइड नोट लिखना पसंद है। हर सुसाइड नोट तब तक के जीवन का सार होता है; एक पड़ाव होता है। और उसके बाद का जीवन एक नया जीवन।

मैं इस जीवन में बहुत सारे सुसाइड नोट लिखना चाहता हूँ। सुसाइड नोट विराम हैं, मृत्यु पूर्ण विराम।

तुम इसे पढ़ कर भूल जाना।

तुम्हारा,
मैं।

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दृश्य: कनॉट प्लेस का एक कॉफ़ी शॉप।

दोनों 12 साल बाद मिल रहे हैं। कॉलेज के दिनों में जंतर-मंतर पर आंदोलन के साथी। अब वो नौकरी करने लगा है। और वो मेरठ में अपने परिवार के साथ रहती है।

"मुझे कभी लगा नहीं था कि हम इस जीवन में दोबारा मिलेंगे। मैं तो मान चुका था कि हम दोनों के रास्ते अलग हो चुके हैं।"

"मैंने भी नहीं सोचा था। लेकिन कई सालों बाद दिल्ली आना हुआ तो सोचा तुमसे मिल लूँ। इसलिए फेसबुक पर मेसेज किया।"

"अच्छा किया जो तुमने मेसेज किया। मैं तो कई बार मेरठ आया। लेकिन हिम्मत नहीं हुयी तुम्हें मेसेज करने की। और अब टाइम भी तो नहीं रहता। सिर्फ ऑफिस के काम से मेरठ आता हूँ।"

"तुम्हें याद है जंतर-मंतर और आर्ट्स फैक्लटी के धरने और आंदोलन! तुम्हारे चक्कर में क्या-क्या नहीं किया मैंने।"

"तुम्हारी समझ भी तो अच्छी थी उन सभी इशूज़ की। इतने साल में मुझे कोई लड़की मिली नहीं जिसकी पॉलिटिकल क्लैरिटी तुम्हारे जैसी हो।"

"वो सब कॉलेज के टाइम की बातें हैं। सोचा था दुनिया बदल ही देंगे। दो बच्चे हैं। उन्हें भी बदल नहीं पाती! और आजकल स्कूल में इतना होमवर्क मिलता है बाबा! पूरा दिन उनके होमवर्क कराने में गुज़र जाता है। जानते हो, बहुत थक जाती हूँ।"

"तुम्हारे बाबा कहने की आदत नहीं गयी।"

"हा! तुम्हें ये याद है? बहुत बदल गयी हूँ लेकिन। तुम कैसे हो? क्या चल रहा है जीवन में?"

"मैं बहुत खुश हूँ। अच्छी नौकरी है। ऑफिस घर के पास ही है। तो ज़्यादा ट्रैवेल नहीं होता। ऑफिस में सबकुछ है। वहीँ सुबह जिम कर लेता हूँ। तीन महीने पहले मुझे अपनी केबिन भी मिली है। सब बढ़िया है।"

"हम्म..."

"क्या?"

"तुम्हें बिल्कुल भी याद नहीं होगा। बहुत मामूली बात है लेकिन... छोड़ दो।"

"क्या? बताओ तो... इतना कुछ तो हमने छोड़ दिया। बातों को भी..."

"यहीं सेंट्रल पार्क में तुमने कभी कहा था कि अगर हम कभी अलग हुए, और कई सालों बाद तुम्हें ये पता चले कि मैं किसी बड़े कंपनी में एक अच्छी नौकरी कर रहा हूँ, तो समझ जाना कि मैं खुश नहीं हूँ..."

"... हा! मैं भी कितना बेवकूफ था ना!"

"हाँ, तुम बहुत बेवकूफ थे।"

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इस रिश्ते को ख़त्म हुए बारह साल बीत गए हैं। लेकिन वो एहसास अब भी मेरे साथ है, स्ट्रांग कॉफ़ी की तरह।
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मैं यहीं कहीं रहती थी। यहाँ जहाँ वो नहीं था। वो भी यहीं कहीं रहता था। वहाँ जहाँ मैं नहीं थी। हम साथ-साथ रहते थे, और साथ नहीं भी। कौन किसका है ये सोचते हुए एक रिश्ता निभा रहे थे।

मेरा इस रिश्ते में ना रहने का कारण उसका ज़्यादा रहना था।
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हम दोनों प्यार करते थे। मेरा उससे प्यार करना उतना ही सच है जितना मेरा होना। मैं कहीं भी जाता हूँ, मेरा कुछ हिस्सा उसके पास ही रखा होता है। प्यार कभी ख़त्म नहीं होता। वो सतही धूल के नीचे दबा होता है। वो अगर एक फूँक भर देती, तो वो उभर आता।

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सोलह साल पहले। कॉलेज के शुरुआती दिन। थिएटर क्लब के ऑडिशन चल रहे हैं। लड़का और लड़की भी ऑडिशन दे रहे हैं।

लड़का: “शायद आपका फ़ोन बज रहा है।”

लड़की: “जी नहीं। मेरा फ़ोन साइलेन्स पर है।”

लड़का: “आप इकोनॉमिक ऑनर्स में हैं ना?”

लड़की: “मैं आपकी ही क्लास में हूँ। इंग्लिश ऑनर्स। आपने ध्यान से नहीं देखा होगा।”

“मुझे लग रहा था कि मैंने कहीं तो आपको देखा है। सॉरी।”

“सॉरी की बात नहीं है। बस एक हफ़्ता तो हुआ है कॉलेज को शुरू हुए। किसी को किसी का चेहरा याद रहे ज़रूरी नहीं।”

“मैं रोहित।”

“मैं प्रीती।”

“सो, थिएटर?”

“हाँ। बचपन से मन था कभी तो थिएटर करूँ। स्कूल में भी नहीं किया। कॉलेज ऑडिशन का देखा तो सोचा कि कर सकती हूँ… आप?”

“मैं तो थिएटर करता हूँ। बाहर भी एक ग्रुप है। उनके साथ करता हूँ। कॉलेज में भी जॉइन कर लूँगा तो अच्छा रहेगा।”

“ओह, तो आप वेटरन हैं।”

“अरे नहीं। और ये आप मत कहिये। काफ़ी फॉर्मल लगता है।”

“आप ही आप कर रहे हैं। वरना मुझे तो काफ़ी ऑकवर्ड लग ही रहा था आप करके बात करना।”

“ओ! सॉरी! अब रेस्पेक्ट नहीं दूँगा!”

“अरे, रेस्पेक्ट और ‘आप’ का क्या लेना देना? रेस्पेक्ट तो बिना आप बोले भी दे सकते हैं।”
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ऑडिशन के बाद।

“प्रीती! प्रीती!”

“अरे, तुम।”

“हाँ। तो कैसा रहा ऑडिशन? तुम्हारा सलेक्शन हुआ?”

“नहीं यार। मेरा तो नहीं हुआ। बोला कि एक्सपीरियंस कम लग रहा है। अरे, फर्स्ट ईयर में हूँ। कैसे एक्सपीरियंस आएगा? ये थर्ड ईयर वाले बहुत ज़्यादा समझते हैं अपने आप को। तुम्हारा तो हो गया होगा?”

“हाँ, हो तो गया है। मैं कुछ बात करूँ क्या तुम्हारे लिए…”

“नहीं नहीं। मुझे थिएटर का क्राउड भी कुछ खास नहीं लगा। इसी बहाने क्लास थोड़ा ठीक से अटेंड कर लूँगी। चलो, फिर क्लास में मिलेंगे।”

“ओके। मिलते हैं आराम से।”
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कुछ महीने बाद। कॉलेज इलेक्शन के दौरान।

“प्रीती…”

“हाँ रोहित। तुम क्लास क्यों नहीं आते? तुम्हारे अटेंडेंस का क्या होगा?”

“अरे रिहर्सल होते हैं ना। अटेंडेंस का टेंशन नहीं है। वो तो हम थिएटर वालों का मैनेज हो जाता है। लेकिन मुझे तुम्हारा फ़ेवर चाहिए।”

“कैसा फ़ेवर?”

“एक्चुअली, मैंने एक पार्टी जॉइन की है। हमलोग इलेक्शन भी लड़ रहे हैं। तो तुम भी सपोर्ट करो हमें।”

“कैसे सपोर्ट करूँ? और, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है पार्टनर?”

“अरे, हम तो लाल हैं। अपनी पॉलिटिक्स बताओ?”

“अपना तो कोई रंग नहीं है। जो सही है वो सही है। जो गलत है वो गलत है।”

“मतलब कोई आइडेंटिटी नहीं है। पता है, समाज के लिए ऐसे लोग सबसे ख़तरनाक होते हैं जो असल में श्योर नहीं होते कि उनकी पॉलिटिक्स क्या है।”

“तुम्हें कैसे पता कि मुझे अपनी पॉलिटिक्स नहीं पता? और तुम सिर्फ एक पार्टी जॉइन करके मोरल हाईग्राउंड कैसे ले सकते हो? अभी तो फ़ेवर चाहिए था तुम्हारी पॉलिटिक्स को!

“अरे, मेरा मतलब वो नहीं था। मैं कह रहा था कि एक पार्टी रहती है तो अपने विचारों को दिशा मिल जाती है… इसलिए पार्टी जॉइन कर लो। मेरा टारगेट भी पूरा हो जाएगा…”

ज़ोर से हँसते हुए, “अरे, समाज के रक्षक के टार्गेट्स भी हैं! तब तो जॉइन करना ही पड़ेगा। वरना क्रांति कैसे आएगी!”

“अरे, साथ काम करेंगे… क्रांति आ जाएगी।”

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हमारे जीवन में सिर्फ़ अदाकार आते हैं, अलग अलग किरदारों में। मैं भी जिनके जीवन मे कदम रखता हूँ दरअसल उनके जीवन के नाटक में एक किरदार ही हूँ।

हम सब झूठे हैं। लेकिन इस झूठ के सच का अनंत आनंद है। मुझे सच बोलने वाले किसी किरदार का इंतज़ार नहीं है। ना ही मैं वो किरदार हूँ जो कहीं जाकर सच बोलेगा। मुझे बेहद झूठे और झूठ में सच जीने वाले लोगों का इंतज़ार है। जो इस भ्रम में हैं कि वो दरअसल सच्चे हैं, ऐसे लोगों से दूर एक दूसरे शहर में नाटक खेलना चाहता हूँ।

हमारा ये भ्रम कि हम दुनिया बदल रहे हैं, बहुत बड़ा था। इस भ्रम का झूठा ‘सच’ हमें एक नशा देता था। व्यक्तिगत जीवन उतना मायने नहीं रखता था।
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बेहद प्यार में डूबा हुआ होने के एहसास से बेहतर कुछ भी नहीं होता होगा। लोगों का बेहद प्यार में डूबा पल मानव समाज के सबसे बेहतरीन पलों में से एक होगा।

मैं जितने देर भी प्यार के करीब रहती हूँ उतनी देर एक बेहतर इंसान कैसा होता है, महसूस करती हूँ।
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मुझे नहीं पता बेहतर प्यार कैसे करते हैं। शायद सबकुछ खो कर भी जिसकी चाहत बराबर रहे वो बेहतर प्यार होता हो। खुसरो का निज़ामुद्दीन के लिए, या मेरे बचपन के एक दोस्त का मेरी क्लास की एक लड़की के लिए। ज़रूरी नहीं कि सभी प्यार की कहानियाँ अमर हो जायें। अमर होना अप्राकृतिक भी है। इंसान उस पल में क्या बन पाया, ये ज़रूरी है। 

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दृश्य: आर्ट्स फैक्लटी, डी.यू, का मैदान। यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन के खिलाफ एक कैंपेन के बाद। दोनों सुबह से नारे लगाने के बाद फुर्सत के पलों में।

लड़की: “तुम कोई कविता सुना सकते हो क्या?”

लड़का: “अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें…”

“बेहतर कविता।”

“ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो, नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें।”

“मैं थकी हुई हूँ। और फिलहाल फ़राज़ साहब मुझे कोई सुकून नहीं दे रहे। कुछ बेहतर सुनाओ। थिएटर करने वाले के पास तो ख़ज़ाना होना चाहिए ग़ज़लों और कविताओं की।”

“बेहतर कविता क्या है? जो पाश ने लिखी है? या जो ग़ालिब ने?”

“बेहतर वो है जो फिलहाल मेरा पेट भर दे।”

“तो इस समय सदी के सबसे बड़े शायर कैन्टीन के मोहन भैया हैं।” 
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दोनों खाना खाते हुए।

“ये बताओ आज के कैंपेन का एडमिनिस्ट्रेशन पर कुछ फ़र्क पड़ेगा?”

“कैसे नहीं पड़ेगा! बिल्कुल पड़ेगा। दो से तीन हज़ार स्टूडेंट्स ने हल्ला किया है। वी.सी की हालत टाइट हो गयी थी। मैंने खुद देखा किस तरह वो डरा हुआ था।”

“जानते हो, पिछले साल भी ऐसा हंगामा हुआ था। और उसके पिछले साल भी। और हम आज फिर हंगामा कर रहे हैं। बार-बार लगातार हंगामा करने की क्या ज़रूरत अगर फ़र्क पड़ रहा हो तो?”

“हम पॉलिटिकल लोग हैं। हम इतनी सतही बात नहीं कर सकते। पॉलिटिक्स एक प्रक्रिया है। तुम अंत की खोज कर रही हो। हम अभी शुरुआती दौर में हैं। पिछले दस साल में यूनिवर्सिटी का फ़ीस सौ प्रतिशत बढ़ चुका है। लेकिन ये पाँच सौ प्रतिशत भी बढ़ सकता था। हम अपना काम तो करते रहेंगे ना।”

“मैं इनकार नहीं कर रही। मैं बस पूछ रही हूँ कि ये प्रक्रिया कहीं छलावा तो नहीं है हम सभी को व्यस्त रखने के लिए।”

“हो भी सकता है। मैं मना नहीं करता हूँ। लेकिन इसकी खोज तो हमें खुद ही करनी है। जैसे तुम्हारे मन में ये सवाल आना बड़ी बात है।”

“अब ये सवाल तुम्हारे मन में भी डाल दिया है कॉमरेड। पार्टी से रिज़ाइन कर डालो!” बोलते-बोलते हँस पड़ती है।

“इतना नकली कम्युनिस्ट नहीं हूँ कि गर्लफ्रेंड की बात में आकर पार्टी छोड़ दूँ। चलो, तुम्हें भी क्लास के लिए जाना है, और मेरी भी रिहर्सल है।”
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“आज शाम कहीं चलते हैं?”

“कहाँ?”

“सेंट्रल पार्क… डायरेक्ट मेट्रो।”

“मेरी रिहर्सल लंबी चलेगी। अच्छा, कल का प्लान करें क्या?”

“उफ्फ! तुम और तुम्हारी रिहर्सल। बस पछताओगे!”

“आप मेरे पछतावे की चिंता ना करें। बस ये बताइये कि क्या कल का डेट हमें मिल सकता है?”

“मेरी सेक्रेटरी से पूछ लेना! अच्छा बाए!”

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मैं जानती थी कि तुम्हें थिएटर और पार्टी की ज़्यादा चिंता थी। वो तुम्हारी प्रायोरिटी थीं। मैंने तब भी कंप्लेन नहीं किया। अब भी नहीं करती हूँ। लेकिन, हम शायद साथ नहीं चल रहे थे। 

मैं चाहती थी कि हम साथ चलें। तुम थोड़ा आगे चल रहे थे। मैं कभी-कभी बोलना चाहती थी कि ये वाला मोड़ लेना है, लेकिन तुम दूसरी तरफ़ बढ़ चुके होते थे। मैं तुम्हें बुलाती थी। लेकिन उन नारों और थिएटर की तालियों में मेरी आवाज़ तुम तक नहीं पहुँचती थी। मैं कई बार रुकती भी थी। लेकिन तुम कई बार मुड़ते नहीं थे।

अब शायद तुम मुड़ सकते हो। लेकिन वो सारे मोड़ नक्शे पर नहीं हैं।

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"मैंने कई बार तुमसे कहा है कि टूथपेस्ट को ऊपर से नहीं, नीचे से प्रेस किया करो। लेकिन तुम मेरी बात नहीं समझते।" प्रीती सुबह सुबह झल्लाते हुए रोहित से बोल रही थी। "मेरी एक बात मान लेने से घर नहीं गिर जाएगा, या तुम कम रिबेलियस नहीं हो जाओगे।"

"प्रीती... सुबह सुबह मत शुरू हो जाओ यार। अभी आधे घंटे पहले सोने आया हूँ। पूरी रात हमलोग नाटक की रिहर्सल कर रहे थे। मेरा पहला टिकेटेड शो है। कुछ देर में वापस जाना है। प्लीज़..." रोहित नींद में ही था।

कॉलेज ख़त्म हो चुका है। रोहित अब सिर्फ थिएटर करता है और प्रीती नौकरी। जब दोनों के बीच चार साल पहले प्यार शुरू हुआ था तब ये किसी ने नहीं सोचा था कि जीवन में इस तरह के भी मुद्दे आएंगे जिन्हें सुलझाना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना प्यार। टूथपेस्ट भी प्रेम की तरह ज़रूरी है, और चाय की कप को बिस्तर के नीचे से हटाना भी। प्रेम के मायने प्रेम से परे कुछ और होते हैं। प्रेम इन सबके इर्द-गिर्द ही कहीं रहता है।

“बाबा! मैं सिर्फ़ इतना कह रही हूँ कि मेरी बात को थोड़ा तो ध्यान में रख सकते हो ना? मैं ऑफिस जा रही हूँ। आज थोड़ा लेट ही आऊँगी।”

“ठीक है।” रोहित नींद में ही बोल रहा था।
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“प्रीती, तुम अपने ऑफिस में कुछ ज़्यादा ही इन्वॉल्व नहीं हो गयी हो?”

“ज़्यादा ही इन्वॉल्व होना होता है। दाल में नमक कम है। प्लीज पास करना।”

“ये लो। हमलोग तो कभी आराम से बैठ कर बात ही नहीं कर पा रहे हैं।”

“कैसे करेंगे… कभी तुम्हारे रिहर्सल, तो कभी मेरी ऑफिस। ये दिक्कत तो रहेगी ही।”

“तुम्हारा भी सेलेक्शन कॉलेज थिएटर क्लब में हो जाता तो शायद ये दिक्कत ना होती।”

“रोहित, साथ थिएटर करने वाले सभी लोग रिलेशनशिप में नहीं आ जाते।”

“तो ऐसे कैसे चलेगा? हमलोग अंजान बनकर रह गए हैं।”

“जो कंप्लेन मेरा होना चाहिए, वो तुम कर रहे हो?”

“क्या फ़र्क पड़ता है कि कौन कंप्लेन कर रहा है। हम दोनों को सच तो पता ही है ना।”

“हाँ। पता है।”

“तो?”

“तो कुछ भी नहीं। आज भी थोड़ा लेट हो जाएगा।”

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हम दोनों लेट कर चुके थे। कई साल साथ रहने के बाद भी हम नहीं समझ पाए एक दूसरे को। बहुत कुछ समझा। एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखा। लेकिन हम वो नहीं कर पाए जो करना चाहते थे।

हम दुनिया घूमना चाहते थे। चेयरमैन माओ के मेमोरियल को साथ देखना चाहते थे। और स्विट्जरलैंड भी साथ जाना चाहते थे। इजिप्ट के पिरामिड्स पर फ़ोटो खींचना था। और नॉर्थन लाइट्स को साथ महसूस करना था। हमारे सपने बहुत सुंदर थे। हम दोनों ने कई साल इन सपनों को पाला पोसा था।

और इन सबका भी अंत आया।
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हमने कुछ नहीं किया।

हमने सिर्फ अपने 'होने' का एक घर बना लिया- ईंट पत्थर का नहीं, यादों का। खाली वक़्त में बैठे-बैठे इंस्टाग्राम पर मैं तुम्हारे सिर्फ वो फ़ोटो देखता हूँ जो मैंने खींची हैं। उस वक़्त में हम साथ थे। बाकी फ़ोटो भी शायद अच्छे हों, लेकिन वो हमारे 'साथ होने' के पल नहीं थे। जब मैंने तुम्हारी फ़ोटो खींची थी तो हम कुछ नहीं कर रहे थे। हमें नहीं मालूम था कि कुछ समय बाद ये फ़ोटो मुझे वो सुकून देंगे जो दफ़्तर से लौटने के बाद घर देता है। बाकि सब तो दुनिया है। तुम घर हो।

इंस्टाग्राम पर भी बहुत भीड़ है- दिल्ली के भीड़ की तरह। लेकिन इन सबसे छुपते-छुपाते जब मैं तुम तक पहुँचता हूँ तब मैं भीड़ से दूर खुद को एक पार्क में पाता हूँ, तुम्हारे साथ।

सिर्फ ये साथ होने का एहसास सुंदर है। हमने कुछ नहीं किया... ना हम कुछ करेंगे। लेकिन ये एहसास जब तक हमारे साथ रहेगा, जीवन सुंदर दिखता रहेगा।
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सुनो,

ये एक और सुसाइड नोट है। मैं आत्महत्या नहीं करूँगा, और इसे तुम भूल जाना।

मैं आत्महत्या करना चाहता हूँ। हमेशा। मुझे किसी भी परिस्तिथि से निकलने का सिर्फ एक रास्ता पता है- आत्महत्या। मैं इसे कभी गलत नहीं मानता। खुद से चुनी हुई अनंत की यात्रा कभी गलत नहीं हो सकती।

लेकिन मैं कई कई बार मरना चाहता हूँ। हम जो कहानी लिख रहे हैं उसके कई अंत हैं। और मेरी मृत्यु एक। सभी कहानी एक साथ खत्म नहीं होंगे। कुछ कहानियों को बीच में छोड़ना पड़ेगा।

लेकिन यात्राओं को बीच में कैसे छोड़ दें?

मैंने तुमसे पहले भी कहा है मुझे सुसाइड नोट लिखना इसलिए पसंद है क्योंकि ये तब तक के जीवन का सार होता है। ये विदाई का गीत है जो गद्य में लिखा गया है। मुझे विदाई के गीत भी पसंद हैं और जीवन का रस भी।

मैं जीवन से बेहद प्यार करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि दुनियावी बातें मेरी सुसाइड नोट में कभी ना आयें- जैसे इसने इसको मारा, ये उससे नफ़रत करता है, वो लोग इन लोगों को मार रहे हैं- ये सब छोटी बातें हैं। लेकिन ये छोटी बातें बहुत कुछ कहती हैं जो लगभग रोज़ सुनना पड़ता है- फेसबुक पर, अख़बारों में, न्यूज़ में, टी.वी पर। हम सिर्फ इसे ही सुनते हैं। 

मैं एक अच्छी कविता सुनते हुए विदा चाहता हूँ। फ़राज़ की ग़ज़ल… जो मैंने तुम्हें सुनाई थी।

मैं एक अच्छी दुनिया से विदा चाहता हूँ।

तुम मेरे लिए एक अच्छी दुनिया बना देना। मैं विदा ले लूँगा।

तुम्हारा,
मैं। 
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हम जबसे बिछड़े क्या क्या सोचा करते हैं,
हम बैठे बैठे यादों को पाला पोसा करते हैं
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Wednesday, 11 May 2016

मेट्रो



...और उससे मेरी नज़रें मिली। मैं झेप गया। 

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मेट्रो मेरे जीवन का हिस्सा है। अगर मेट्रो नहीं होता तो शायद मैं अपने पसंदीदा राइटर की कहानियाँ नहीं पढ़ पाता और ना ही अपने हार्ड ड्राइव में रखीं फिल्में देख पाता। क्योंकि ऑफिस जाने में सवा घंटे लगते हैं- और दिन के ढाई से तीन घंटे मैं मेट्रो में ही बिताता हूँ, इसलिए मैं इसे अपना घर भी कह सकता हूँ। लेकिन मेट्रो को घर कहना अजीब लगता है। इसे जीवन का हिस्सा कहना ठीक रहेगा। 

जीवन इतना ख़ास नहीं है कि इसमें हर वक़्त एक कहानी खोज लूँ। लेकिन जब भी सुबह उठता हूँ तो एक कहानी की तलाश करने लगता हूँ। इसी कहानी को खोजते हुए मैं ब्रश करता हूँ। मैं ब्रश करीब दस-बारह मिनट तक करता हूँ। बारह मिनट में एक छोटा सपना देख लिया जा सकता है। जैसे कि मैं एक पहाड़ पर गया (ये सोचने में सिर्फ तीस सेकंड लगेंगे); पहाड़ के आसपास जंगल के बारे में सोचना (ये खूबसूरत हिस्सा है- ढाई मिनट लगेंगे); पहाड़ पर मुझे एक चिड़िया दिखी जो मुझे बुला रही है (एक मिनट); मैं उस चिड़िया से बातचीत करता हूँ, और इसी दौरान एक छोटी सी कविता भी लिखता हूँ (बातचीत और कविता में काफी वक़्त लगता है- चार मिनट लग जाएंगे); फिर चिड़िया मुस्कुराते हुए उड़ जाती है, और मैं धीरे-धीरे उस कहानी से वापस आ जाता हूँ- ब्रश करने (दो मिनट में सबकुछ ख़त्म करना ही पड़ेगा)। 

ब्रश करने के बाद नहाना, और पिछली रात को बाहर निकाले कपड़े पहनने के दौरान भी मैं कई कहानी बुनता रहता हूँ। कहानियों को बुनने में मुझे सबसे मुश्किल उनका अंत खोजने में लगता है। 

इन्ही सब के बीच मैं मेट्रो में बैठ चुका हूँ। मेट्रो में सीट मिलना एक बड़ी बात है- इसलिए जैसे ही सीट मिलती है मैं कुछ करने के प्रेशर में आ जाता हूँ। मतलब ये कि मेट्रो मैं बैठने कि इक्षा हर किसी की होती है, लेकिन हर कोई बैठ नहीं पाता। और अगर मुझे ये मौका मिला है तो मैं इसे यूँ ही नहीं खो सकता। ऐसे वक़्त के लिए मेरे पास एक किताब होती है, या मेरे मोबाइल में सेव की गयी फ़िल्म।

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आज मेट्रो में बैठने के बाद मैं एक पसंदीदा राइटर की किताब पढ़ रहा था। तभी उससे मेरी नज़र मिली, और मैं झेप गया। 

वो ठीक मेरे सामने बैठी थी। उसका नाम मुझे नहीं पता लेकिन अगर मुझे उसका कुछ नाम रखना होता तो मैं उसे स्वाति कहता- वो एक स्वाति जैसी लग रही थी। 

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मैं जिस स्कूल में पढता था वहाँ हर दूसरी लड़की का नाम स्वाति था। ये इतना खूबसूरत नाम था कि हर किसी ने अपने अपने घर में एक स्वाति को देखा हुआ था। मुझे कोई पुराना स्कूल का दोस्त मिल जाए तो हम हर किसी की बात करते हैं, लेकिन हमारे बातचीत के हिस्से में कोई स्वाति नहीं है, क्योंकि स्वाति बहुत सारी थीं। मुझे स्वाति नाम से कोई लड़की याद नहीं आती। 

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ये भी एक स्वाति जैसी थी। 

मैं पसंदीदा राइटर कि कहानी के दूसरे पन्ने पर पहुँचा ही था कि पेज बदलते हुए हमारी नज़र मिल गयी। वो अपनी एक दोस्त के साथ बातें कर रही थी। उसकी दोस्त एक श्रुति जैसी थी- हर स्वाति की एक श्रुति दोस्त होती है। 

मैंने स्वाति को दस सेकंड के लिए देखा होगा। और आठवें सेकंड में उसने मुझे उसे देखते हुए देख लिया। हमारी नज़रें मुश्किल से दो सेकंड के लिए मिली होंगी। दसवें सेकंड में मैं झेप गया। 

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मुझे नज़रें मिलने पर पहले झेंपने की आदत है। मैं बचपन में आँख लड़ाने वाला खेल भी ठीक से नहीं खेल पाता था। मुझे ऐसा लगता है कि लोगों को ज़्यादा देर तक देखो तो वो बुरा मान जायेंगे। क्यों बुरा मान जायेंगे, ये मुझे नहीं पता। लेकिन कई लोग बुरा मान जाते हैं, ये मैं जानता हूँ। लेकिन मुझे ऐसा भी लगता है कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुष ज़्यादा बुरा मानते हैं। स्कूल के दिनों में सीनियर लड़कों से इसलिए भी लड़ाई हो जाती थी कि हमने उन्हें कुछ देर के लिए लगातार देख लिया था। जब मैं भी सीनियर हुआ तो कोई जूनियर कुछ देर के लिए लगातार देखता तो मैं भी बुरा मान जाता और उसे जाकर पीट देता। 

स्कूल की लड़कियाँ कभी भी बुरा नहीं मानती। क्योंकि आजतक मैंने किसी लड़की को किसी लड़के को इसलिए पीटते नहीं देखा कि वो उसे देख रहा था। लेकिन ये भी हो सकता है कि लड़कियों को भी गुस्सा आता हो, और वो लड़ाई करना नहीं चाहती हों। मैं इस बात का ठीक-ठीक जवाब नहीं दे सकता क्योंकि मैं पुरुष हूँ, और जीवन भर सिर्फ पुरुष ही रहा हूँ। मैं शिव की तरह अर्धनारी नहीं बन पाया। अगर ऐसा बनता तो मैं बहुत से सवालों का जवाब जान जाता। 

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मैं आँखें झेंपने के बाद सीधा किताब पढ़ने लगा। लेकिन अब किताब की कहानी से मेरा ध्यान हट चुका था। मुझे एक कहानी अपने आसपास दिखलायी दे रही थी, जिसका नायक मैं था- और नायिका स्वाति। जीवन के किसी भी हिस्से में नायक बनना मुझे सबसे अच्छा लगता है। नायक को लोग ध्यान से देखते हैं। नायक का दोस्त अच्छा लगता है, लेकिन उसे ध्यान से नहीं देखते। उसे नायक के दोस्त के रूप में ही जानते हैं। 

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मैं जब स्कूल में था एक नायक की तरह रहता था (ऐसा मैं सोचता हूँ, और मुझे ऐसा सोचना अच्छा लगता है)। मेरे कई दोस्तों को लोग सिर्फ इसलिए जानते थे क्योंकि वो मेरे दोस्त थे। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ मेरे आसपास नायक बढ़ गए। और धीरे-धीरे मुझे भी लोग किसी के दोस्त के रूप में जानने लगे। मैं ऐसे दोस्तों से दूरी बना कर ही रखता हूँ। 

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अभी स्वाति अपनी दोस्त से मेरे ही बारे में बात कर रही है। ये मैं जानता हूँ। क्योंकि श्रुति ने मुझे अचानक से देखा है। मैं फिर से झेप गया हूँ। उन दोनों के चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं है। इसलिए मैं कह नहीं सकता कि अभी मुझे नायक माना जा रहा है या खलनायक। 

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मुझे खलनायकों से भी कोई दिक्कत नहीं रही। खलनायक को भी लोग ध्यान से देखते हैं। लेकिन उसके बारे में अच्छा नहीं सोचते। 

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स्वाति और श्रुति के बात करने के तरीके में बदलाव भी आ चुका है। मेट्रो में भीड़ नहीं है। मैं स्वाति से बात भी कर सकता हूँ। 

तभी राजीव चौक मेट्रो आ गया। मुझे लगा स्वाति भी वहीँ उतरेगी। लेकिन वो अपना सामान नहीं समेट रही। स्वाति देखने से चांदनी चौक या दरियागंज की लग रही है। इसलिए वो यहाँ नहीं उतरेगी। वो मेरी तरफ़ देख भी नहीं रही। मैं धीरे-धीरे अपना सामान समेट रहा हूँ, और स्वाति को आँखों के किनारे से देख रहा हूँ। 

मैं बाहर निकलता हूँ। जैसे ही गेट बंद होता है, मैं स्वाति को देखता हूँ। वो एक बड़े मुस्कान के साथ मुझे देख रही होती है। श्रुति भी मुस्कुराते हुए स्वाति को देख रही होती है। 

मुझे एक नयी कहानी मिल गयी है। 

...और मैं मुस्कुराते हुए झेप जाता हूँ। 


11.5.2016

Friday, 11 March 2016

बाँसुरी वाला



वहाँ सबकुछ अच्छा था।

उस गाँव में ख़ुशहाली थी। लोग मज़े में थे। सुबह उठते; दिन भर काम करते; शाम में परिवार के साथ हँसते। और सो जाते। फिर सुबह उठते; दिन भर काम करते- पसीना बहाते। और परिवार के साथ हँसते। और सो जाते। ना ज़्यादा कमाते थे, और ना ज़्यादा कमाना चाहते थे।

उसी गाँव में एक बाँसुरी वाला रहता था। जब भी लोग काम करने जाते, वो सड़क किनारे कोई धुन छेड़ता। शाम में जब लोग लौटते वो किसी और धुन के साथ बातें कर रहा होता। लोग उसे देखते, मुस्कुराते और भूल जाते। जब लोग सड़क किनारे बातें करते रहते, बाँसुरी की कोई धुन आस-पास टहलती रहती। वो उन बातों का हिस्सा थी।

सब कुछ अच्छा था।

एक दिन गाँव के कुछ लोग आपस में बात कर रहे थे। बाँसुरी वाला बाँसुरी बजा रहा था। दो लोगों में किसी बात पर कहा-सुनी हो गयी। बाँसुरी बजती रही। वो दो लोग लड़ पड़े। बाँसुरी बजती रही। तभी किसी आदमी ने चिल्ला कर कहा,"बंद करो ये बाँसुरी बजाना। कुछ काम नहीं है क्या!" बाँसुरी वाला चुप हो गया। वो उस इंसान को देखता रहा। कुछ बोलना भी चाहता था शायद, लेकिन चुप रहा।

वो बाँसुरी वाला कहीं चला गया। कोई उसे जानता नहीं था, तो किसी ने उसके जाने को नोटिस नहीं किया। लेकिन वो जा चुका था। हमेशा के लिए।

उसके बाद शामें वैसी नहीं रहीं। जो लोग शाम में सड़क किनारे गप्प मारते रहते थे, उन्हें अब बात करने में मज़ा नहीं आता था।

गाँव का बैकग्राउंड म्यूज़िक खो गया था।

8.3.2016

Monday, 2 February 2015

शहर का अकेलापन‬

-1-

सुबह की धूप और शाम के अँधेरे में फर्क ख़त्म होने लगा है। 
ऐसा ही कुछ सोच कर वो नयी सड़क के अनजान गलियों का सफ़र तय कर रहा था। 
"किधर जाना है?" रिक्शे वाले ने पूछा। 
"नई दिल्ली मेट्रो।"
"40 रुपया।"

वो चलने लगता है। उसे मालूम नहीं कि वो क्यों नयी सड़क गया था- या क्यों नयी दिल्ली जा रहा था। 
"किधर रहते हो?" रिक्शेवाले से पूछा। 
"यहीं- दरियागंज के पास।"
"दिन का कितना काम लेते हो?"
"300 से 400। कोई ठीक नहीं है। कभी ज़्यादा। कभी कम।"
"इस बार किसको वोट दोगे?"
"सोचा नहीं है।" रिक्शेवाला संभल का जवाब देता है।

"ठीक आदमी को वोट देना।"
"हाँ। दे देंगे।"

"यहीं उतार दो।"

एक बेमतलबी संवाद के बाद वो आगे बढ़ चला- कहीं और। उसे नहीं मालूम कि वो कहाँ जा रहा था। एक नशे की हालत में शहर के कोने-कोने भटक रहा था। 
अकेलापन एक नशा है। वो अकेलेपन से लड़ रहा था।

"सिगरेट देना।"
"कौन सी?"
"कोई भी।"

"किधर रहते हो?" दूकान वाले से पूछा। 
"लक्ष्मी नगर।"
"इतने दूर से रोज़ यहाँ आते हो?"
"हाँ।"

और भी लोग थे वहाँ। वो और बात नहीं कर सका। सिगरेट ख़त्म करके वो मेट्रो की तरफ बढ़ा- सोचते हुए कि उसे जाना किधर है।
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Tuesday, 14 January 2014

एक था राजा एक थी रानी


एक था राजा, एक थी रानी...
और इसके बाद हुई शुरू कहानी!

बात कई हज़ार साल पहले की है- तब जब कुछ भी ना था- ना मेट्रो, ना ट्रेन, ना बिजली, ना जहाज, ना देश! लेकिन समाज नया-नया बना था| समाज बनने से पहले सभी खुश थे, आराम से जी रहे थे, खा रहे थे, मौज में थे| समाज किसी ने बनाया नहीं था, वो खुद-ब-खुद बन गया था| कुछ तो ज़रूरत के कारण, और कुछ तो बस ऐसे ही! शौक था सभी को कि कुछ अलग होना चाहिए| भाषा नयी-नयी बनी थी| अब इंसान बातचीत करने लगे थे| सभी बहुत खुश थे| लोगों को खोज-खोज कर बातें करते| एक ही बात दुहराते, और खुश हो जाते| संगीत और कविता ने भी जन्म लिया| सभी को अब बहुत कुछ मिल गया था करने को|

एक इंसान था जो थोड़ा सा अलग था| क्योंकि समाज बनने की शुरूआती ज़रूरत नाम थी, उसका भी एक नाम था- सरछु| सरछु का रंग गेहुआं और कद काठी उस समय के औसत से थोड़ा ज्यादा| वो सोचता बहुत था| उसे ये बात मालूम चली थी कि समाज बनते ही लोग अचानक से बेवकूफ हो गए हैं| सभी ज़रूरत से ज्यादा अलग चीज़ें करना चाहते हैं| उसे ये सब बहुत फूहड़ लगने लगा| 

उन्ही दिनों कुछ लोगों ने मिलकर भगवान को खोजा था| वो सभी बेहद खोजी लोग थे| दिन भर अकेले बैठा करते और शाम तक कुछ ना कुछ खोज लेते| समाज वालों को आश्चर्य हुआ और कुछ भी समझ नहीं आया| जब दो-तीन लोगों ने खोजी प्रजाति से कहा कि उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है कि ये सब क्या है, तो खोजी प्रजाति ने समझाया कि इन बातों को समझना हर किसी के बस की बात नहीं है| बस वही समझ सकता है जो भगवान का करीबी हो| सरछु ने इस बारे में भी सोचा, और समझ गया कि ये एक नया गोरख धंधा है| वो सोचता बहुत था, बोलता बहुत कम|

बात तब की है जब सरछु सभी चीज़ों से- समाज से, भाषा से, भगवान से- तंग आकार दूर निकल पड़ा| सरछु अकेला ही नदी को पार करके एक खोज पर निकल पड़ा| उसकी खोज क्या थी, वो भी नहीं जानता था| बस जानता था कि सभी चीज़ों से दूर जाकर उसे कुछ ना कुछ मिल जाएगा| वो चलता गया, चलता गया, चलता गया...

और एक दिन वो थक गया| उसे पता भी नहीं चला कि वो कितने दिनों से चल रहा है| पानी में देखा तो उसके बाल सफ़ेद हो गए थे| जब अंतिम बार देखा था तो वो काले थे| इस बात से उसने अंदाजा लगाया कि वो कई दिनों से चल रहा है| अब जब वो थक चुका था उसे कुछ समझ नहीं आया कि वो क्या करे| वो बैठा-बैठा सोचने लगा| कई दिनों में पहली बार उसे अपने समाज की याद आई| उसे वहाँ के बेवकूफ लेकिन बहुत ही मासूम लोग याद आने लगे| उसे अपना घर भी याद आने लगा| उसे सब कुछ इतना ज्यादा याद आने लगा कि वो रोने लगा| वो अपने जीवन में पहली बार कुछ भी याद करके रोया था| वो समझ गया कि समाज उसके अंदर बस गया है और वो समाज से दूर नहीं रह सकता| क्योंकि भाषा उसे आती थी, शब्द उसने सीख लिए थे, उसे इंसानों से बात करनी थी| वो वापस लौट चला| वो चलता गया, चलता गया, चलता गया...

और एक दिन वापस अपने समाज में पहुँच गया| अब उसे कुछ भी अजीब नहीं लगा रहा था| सबकुछ अच्छा लगने लगा| लेकिन कोई उसे पहचानता नहीं था| उसने लोगों को बताया कि वो सरछु है| किसी को याद ही नहीं आया कि सरछु कौन था| खैर लोगों ने उसे बोला कि अब आ गए हो तो यहीं रहो| 

लेकिन सरछु अब सिर्फ सोचता नहीं था| उसे अब कुछ करना भी था| वो खोजी लोगों को खोजने लगा| उसे पता था कि खोजी बहुत ही काम के हैं| असल में खोजी लोग ही थे जो समाज को चला रहे थे और अपना भरण-पोषण कर रहे थे| सरछु ने एक खोजी से मुलाक़ात की और कहा कि वो कुछ ऐसा करना चाहता है जिससे समाज का आकार और विस्तार बदल जाएगा| खोजी को पहले तो लगा कि सरछु खोजी और खोजी समुदाय के लिए खतरा हो सकता है| लेकिन जब सरछु ने पूरी बात बताई तो खोजी बहुत खुश हुआ| वो सरछु का मुरीद हो चुका था| 

अगले दिन खोजी एक ढिंढोरा लेकर समाज में निकला| वो ढिंढोरा पीट-पीट कर लोगों को एक जगह जमा करने लगा| सभी लोग आश्चर्य में इकट्ठा होने लगे| जब समाज के सभी लोग इकट्ठा हो गए थे, तब खोजी ने बोलना शुरू किया, “आप सभी लोगों को बताना चाहूँगा कि कल रात मेरी बात भगवान से हुई, और उन्होंने मुझे आप सभी लोगों को ये बतलाने को कहा कि इस समाज का एक मुखिया भी होना चाहिए| मुखिया की ज़रूरत इसलिए है कि बाहर एक और समाज बन रहा है, और वहाँ के लोग बहुत खराब हैं- आप सभी की तरह अच्छे नहीं हैं| वो आपको मार भी सकते हैं| भगवान ने कहा है कि सरछु, जो हम सभी में से इकलौता इंसान है जो समाज के बाहर भी गया है, वही हम सभी का मुखिया होगा| और अब से ये राजा कहलायेगा| इस राजा के लिए रानी भी चाहिए होगी| तुम.... हाँ तुम इधर आओ!” खोजी भीड़ में खड़ी एक नवयुवती को बुलाने लगा| नवयुवती डरी-सहमी खोजी के पास गयी| खोजी ने फिर से कहना शुरू किया, “ये लड़की आज से हमारे समाज की रानी होगी|”
राजा रवि वर्मा की पेंटिंग "राजा-रानी"
सभी लोग बहुत खुश हुए| ये उनके लिए बिल्कुल ही नया अनुभव था| राजा और रानी शब्द उन्होंने पहली बार सुना था| वो सभी इतने खुश हुए कि पागल हो गए| सरछु अब उनका राजा था| नवयुवती उनकी रानी...

और दुनिया को पहला राजा और पहली रानी मिल गए|

एक था राजा, एक थी रानी...
और इसके बाद हुई शुरू कहानी!

-14.1.14

Thursday, 20 June 2013

उलटी


पहाड़ों से घिरे घरोंदें में रहना, चिड़िये की तरह चहकना, ताज़ा हवा में पंख खोल के उड़ना- ये सब वो करना चाहता था| लेकिन लोग इसे रोमांटिसिज़्म कहते थे| तो वो चुपचाप ट्रेन की टिकट कटा कर नैनीताल के पास किसी गाँव में जाकर रह लेता था- कभी कैंप में या फिर कभी किसी सस्ते होटल में| लोग पूछते कहाँ जा रहे हो तो कहता “वेकेशन पर जा रहा हूँ”- अब कहाँ बताता फिरे कि मौका मिला है, चिड़िया बनने जा रहा हूँ|

लेकिन पहाड़ों पर जाना इतना आसान नहीं था| पहले तो शहर के भागदौड़ से छुट्टी लेना, फिर पैसे जोड़ कर टिकट कराना, फिर पता करना कि रहने का इंतज़ाम क्या होगा- इंतज़ाम ना भी हो तो भी चला जाता क्योंकि उसे हद की बेहदी तक विश्वास था कि इंसान किसी भी हालात में सर्वाइव कर सकता था| पैसे भी किसी न किसी तरह जोड़-जार लेता| क्योंकि कुछ खास काम नहीं करता था तो छुट्टी लेना कोई बड़ी बात नहीं थी| 

सिर्फ और सिर्फ दिक्कत जो थी वो थी पहाड़ों पर चढ़ाई करते वक्त उलटी आना! ये बहुत बड़ी दिक्कत थी- इतनी बड़ी कि ये कहानी लिखनी पड़ी! 



पहले-पहल तो उसे बहुत दिक्कत मालूम हुआ| उसने ठान लिया कि अब चाहे खुदा का बच्चा भी उसे बुलाये या खुद खुदा ही पहाड़ों पर टैक्सी चलाये- वो दुबारा किसी पहाड़ पर नहीं जायेगा| लेकिन पहाड़ कुछ खास होते हैं, ये समझने में उसे कुछ ज्यादा समय नहीं लगा| उसने किसी ज्योतिष के माफिक अपने आपको ये फैसला सुनाया कि पहाड़ों पर जाते रहने से उसके रूह को कुछ ऐसा मिलेगा जो शहर में मौजूद नहीं है| वो क्या है जिसके लिए उसे पहाड़ों के चक्कर लगाना था वो नहीं जनता था| 

इसके बाद भी मुद्दे कि बात नहीं बदलती| उलटी| 

उलटी एक खास प्रकार की क्रिया है जिसके ऊपर इंसानी ताकतों का वश नहीं होता| इसे जब आना होता है तो आता है| मन बेचैन सा हो जाता है| और सबसे बड़ी बात आपने जो कुछ भी खाया हो- भले ही बहुत ही महँगा और हाइजेनिक- वो अनपचा खाना बाहर निकल आता है! आप चाह कर भी उसे रोक नहीं सकते| जब वो खाना जो आपने बड़े चाव से किसी खास इंसान के साथ खाया था, आपके मुँह से निकल रहा हो तो आप बस उन सुनहरी यादों को याद कर सकते हैं, दुबारा उस स्वाद का आनंद नहीं ले सकते| 

उसके साथ एक और दिक्कत थी कि उलटी के बाद उसे- हर किसी की तरह- कमजोरी का एहसास होता| तबियत नासाज़ हो जाती और पहाड़ों पर चिड़िया बनने कि चाहत खत्म होने लगती| ये शुरूआती दिनों कि बात थी| उसके बाद वो बीसीयों बार अलग- अलग पहाड़ों पर गया लेकिन हर बार उसे मुनासिब मात्रा में उलटी होती| परेशानी कि हद तक होती| अलबत्ता, बेहद तक होती| 

इसके बावजूद वो पहाड़ों पर जाता- जब मौका मिलता शहर की धमाचौकड़ी से एस्केप कर जाता| दर असल वो एक एस्केपिस्ट था| लेकिन मुआ उलटी उसका पीछा नहीं छोड़ती| कुछ लोगों ने उसे सलाह दी “फलां-फलां दवाई खा लिया कर| उलटी नहीं होगी|” उसको समझ नहीं आता ये कैसे मुमकिन है| अगर मुझे मोशन सिकनेस की दिक्कत है और मोशन भी हो रहा है तो कोई दावा इसका इलाज कैसे कर सकती है? उसे इतना मालूम था कि उसका शरीर उससे ज्यादा समझदार है| शरीर को मालूम था किस वक्त कैसे रिअक्ट करना है| अगर शरीर किसी भी कारण से कुछ चीज़ बाहर निकालना चाहता है, और वो उसे किसी तरीके से रोके, तो ये तो प्राकृतिक नहीं है| कुछ और मुआमलों में कॉन्सटिपेशन की दिक्कत भी हो जाती थी| ये कुछ दूसरा मामला था, लेकिन दिक्कत तो यहाँ भी बराबर हो सकती है!

उसने किसी भी तरह के फलां-फलां दवाई खाने से इनकार कर दिया| लेकिन लोगों को ये बात पसंद नहीं आई| हर मर्तबा जब वो उलटी करता तो लोग उसे ताने मारते “मत खाओ फलां-फलां दवाई| और करो उलटी|”

इस बीच एक खासा वक्त गुज़र गया| पहाड़ों का जाना भी कम नहीं हुआ और ना ही उलटी का आना| लेकिन कुछ ऐसा हुआ जो खास था| उसे धीरे-धीरे उलटी करने में आनंद आने लगा| 

मुँह में नमकीन स्वाद का आना, पेट में एक भीनी दर्द का एहसास होना, सर का शुन्य में चले जाना- ये सब अब सफर का हिस्सा बन चुके थे| टैक्सी से सर बाहर निकाल कर अपने मुँह से अपने पसंदीदा खाने को बाहर जाते देखना एक अद्भुत एहसास था- पूर्ण रूपेण मेडीटेशन| उसे (फिर से) हद की बेहदी तक विश्वास हो गया था कि ये कुछ खास है जिसके बारे में कोई बात नहीं करता| सबसे खास एहसास होता था जब उलटी आती थी और उसका पेट खाली होता था- सिर्फ पानी के अलग अलग रूप बाहर निकलते थे जो उसके दाँतों को खट्टा कर जाते| उसे अपने खट्टे दाँतों को आपस में रगड़ना बहुत अच्छा लगने लगा| वो अब बहाने खोजने लगा उलटी करने के, जिसके कारण पहाड़ों के चक्कर बढ़ गए, और लोगों के ताने भी|

वक्त आ गया था जब लोगों के ताने और उलटी की चाहत के बीच युद्ध शुरू हो चुके थे| उससे लोग पूछते कि फलां-फलां दवा क्यों नहीं ले लेता, तो उसके पास कोई जवाब नहीं होता| अब किसे समझाने बैठे कि उलटी करना उसे अच्छा लगता है| ये एक बेतुका सा जवाब मालूम होता जिसे लोग मसखरी समझते| लेकिन वो मसखरा नहीं था| उसे मसखरी बिल्कुल भी नहीं आती थी| 

ये वो वक्त था जब वो लगातार कई महीनों तक पहाड़ों के चक्कर लगाता रहा| अलग अलग लोग उसके साथ अलग अलग जगह जाते थे| कुछ नए, कुछ पुराने- दोस्त बन जाते थे| जो भी उसे उलटी करता देखता कहता कि इतनी तकलीफ क्यों ले रहे हो, फलां-फलां दवाई क्यों नहीं खा लेते? वो जवाब नहीं दे पाता| लेकिन कुछ लोग इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने ने उसे बहुत खरी-खोटी सुना डाली| उनका कहना साफ़ था “तुम्हारी वजह से हमारी गाड़ी गन्दी हो जाती है| तुम्हारी वजह से हमारा वक्त खोटा होता है| तुम कोई तीस मार खान हो क्या जो फलां-फलां दवाई नहीं खाओगे! तुम्हे ये दवाई खानी ही होगी!”

मामला संजीदा हो चला था| उसे पहाड़ों से ज्यादा उलटी से प्यार हो गया था| वो अब किसी कि सुनना नहीं चाहता था| लेकिन उलटी करने के लिए उसे टैक्सी पर चढ़ना होता था| लेकिन अब उसे कोई भी अपने साथ ले जाने को तैयार नहीं था| बात बढ़ती चली| उसका दिल बैठता चला|



एक दिन उसे एक इंसान ने फलां-फलां दवाई दी और कहा, “सोचो मत| हर कोई ये दवा खाता है| मैं, वो, और वो| तुम्हारे पिता, तुम्हारी माँ, तुम्हारे मौसा और मामा भी- हर कोई| तुम भी खा लो और हमारी तरह आराम से जियो|”

उस दिन उसने फलां-फलां दावा खा ली| आज भी खाता है| सब कहते हैं वो बहुत आराम से सफर करता है, उसे कोई दिक्कत नहीं होती| 


4.6.13

Saturday, 29 December 2012

लूडो


“आप चलिए| अब आपका चांस है|”

“हाँ पता है| रुकिए, हम जरा चाय चढ़ा कर आते हैं| तब तक आप गोटी इधर-उधर मत कर दीजियेगा| हम सब देख रहे हैं|” 

और गोमती चाय चढ़ाने किचन में चली गयीं| सिन्हा जी ने जैसे ही देखा की गोमती जी किचन में गयीं, उन्होंने अपनी दो लाल गोटियों को कुछ कदम आगे बढ़ाया, कुछ पोजीशन बदला ताकि गोमती जी की पीली गोटियाँ उन्हें काट ना सके| पीली गोटियों को भी थोड़ा सा कंविनिएंट पोजीशन में रख दिया| अब खेल वो जीत रहे थे| फिर वो अखबार पढ़ने लगे ताकि गोमती जी को कोई शक ना हो सके| 

ये सिलसिला कई सालों से चल रहा है| सिन्हा जी को रिटायर हुए सात साल हो गए हैं| वो बिहार सरकार के बिजली विभाग में हेड क्लर्क हो कर रिटायर हुए थे| सीधे सादे व्यक्तित्व वाले इंसान थे| करियर में कभी किसी ऐसे चक्कर में नहीं पड़े जिसके कारण उन्हें शर्मिंदा होना पड़ा हो| वही सब कुछ करते थे जो उनके दफ्तर के बाकि सभी साथी करते रहे| स्वभाव के चिडचिडे नहीं थे| सुगर की दिक्कत थी उन्हें, फिर भी चाय में चीनी डलवा लेते थे| गोमती उन्हें कभी चीनी वाली चाय नहीं देती थी, तो वो सिर्फ दफ्तर में ही ये शौक पूरा कर पाते थे| जबसे रिटायर हुए, ये शौक भी जाता रहा| और सात सालों में बिना चीनी वाली चाय की आदत हो गयी है| 

“लीजिए|” गोमती ने चाय पकड़ाते हुए कहा| “फिर से बदमाशी कर दिए| गोटी सब ठीक कीजिये| हमको सब याद है कौन गोटी कहाँ पर था|” और सिन्हा जी मुस्कुराने लगे| 

“तो तुम्ही जीतोगी हमेशा? हमको भी जीतने दो|” 

“तो जीतिए| मना कौन किये हुए है| लेकिन गलथेतरई मत कीजिये| हम जीतने लगे तो पूरा खेल बिगाड़ दीजियेगा| खुद से चाय काहे नहीं बनाते हैं|” 

“अच्छा| चलो ना भाई, तुम्हारा चांस है|” 

“पहले गोटी ठीक कीजिये|” 

सिन्हा जी को कभी भी लूडो खेलना अच्छा नहीं लगता था| जबकि गोमती लूडो खेलना पसंद करती थीं| जब सिन्हा जी ऑफिस जाते थे तब वो घर में काम करने वाली दाई के साथ बैठ कर खूब लूडो खेलती थीं| बच्चे पढ़ाई करने के लिए दिल्ली में रहते थे| छुट्टियों में आते तो माँ का पूरा दिन बच्चों की देखरेख में गुज़र जाता| स्वाति और अविनाश लूडो खेलने को समय की बर्बादी समझते थे, तो उनके आते ही गोमती जी का लूडो खेलना बंद| उन्हें भी ध्यान नहीं रहता था, और बाकी सब काम में वक्त कट जाता था| 

अब बच्चे बड़े हो गए हैं| शादी हो गयी है दोनों की| अविनाश दिल्ली में ही रहने लगा है, और स्वाति बेगुसराय में| बेगुसराय पटना से बहुत दूर नहीं है, तो महीने दो महीने में सिन्हा जी और गोमती से आकर मिल लेती है अपने बच्चों के साथ| अविनाश का आना थोड़ा कम होता है| जब कभी कोई पर्व-त्यौहार हुआ, वो भी अपने परिवार के साथ आ जाता है| बस पर्व-त्यौहार ही हैं जब सम्पूर्ण परिवार का मिलन होता है| बाकी वक्त घर में सिन्हा जी, गोमती और लूडो| 

रिटायरमेंट के बाद घर में बैठे-बैठे सिन्हा जी को बोरियत होने लगी थी| आदत थी सुबह उठने की, वो तो जाने से रही| घर के काम-काज में गोमती का हाथ बटाने लगे तो दाई को हटा दिया गया| कुछ पैसे भी बचने लगे और दम्पति के लिए कुछ काम निकल आया अपने आपको व्यस्त रखने के लिए| टीवी भी खराब होने लगी थी| जब नौकरीशुदा थे तब ही खरीदा था| अब टीवी में ना तो रंग साफ़ पता चलते ना ही आवाज़ ही ठीक से आती| अच्छा खासा हीरो भी गूँगा और बदसूरत नज़र आता था उन्हें| टीवी खरीदने की इक्षा तो कई बार हुई, लेकिन सिन्हा जी के पास कोई बचत राशि थी नहीं तो गोमती ने कभी बोला नहीं| जो भी कुछ पेंशन आता उससे घर का किराया, राशन और दवा का ही इंतज़ाम हो पाता था| थोड़ा बहुत जो बचता उसे गोमती जमा कर देती थी अपने गुल्लक में| कहती बुरे वक्त में काम आएगा| सिन्हा जी हमेशा मुस्कुरा देते| 

रिटायरमेंट के साल भर बाद ही गोमती को लूडो खेलने की सूझी| घर में बैठे-बैठे क्या करते, तो सिन्हा जी भी खेलने लगे| शुरुआत में बड़े जल्दी ऊब जाते थे| कहते ये क्या तरीका है वक्त काटने का| “आप यही सब करती थी जब हम ऑफिस में रहते थे?” गोमती शरमाते हुए मुस्कुराती| वो मुस्कराहट एक पाँच साल के अबोध बच्चे सी थी| सिन्हा जी ने ऐसी मुस्कराहट कभी देखी नहीं थी गोमती के चेहरे पर| बस लूडो का सिलसिला शुरू हो गया| 

पहले-पहल तो दिन में कोई तीन-चार बार लूडो खेलते दोनों| सुबह के चाय के साथ, दोपहर के वक्त सोने से पहले, शाम में नाश्ते के साथ और फिर रात में अगर इक्षा हुई तो| फिर धीरे-धीरे ये दिनचर्या का हिस्सा हो गया| जब मौका मिलता दोनों लूडो खेल लेते| 

सिन्हा जी ने गोमती के बारे में वो सब जाना जो वो पहले कभी जान नहीं सके थे| चालीस साल की शादीशुदा जिंदगी में कितने ही पल साथ बिताए थे, लेकिन उन्हें ये कभी पता नहीं चला था कि जब गोमती की पीली गोटी सिन्हा जी की लाल गोटी को काटती है तो वो गोमती के लिए अदभुत पल होता है| कितनी ही बार गोमती ने लाल गोटी काटते ही ठहाके मारे हैं, और कितनी ही बार खुशी से नाच पड़ी हैं| ऐसा प्रतीत होता जैसे सिर्फ एक गोटी काटने से गोमती अपनी हर दबी इक्षाओं को बहार निकाल देती| बहुत कुछ था जो वो सिन्हा जी से नहीं कह सकी थीं| जब पीली गोटी लाल गोटी को काटती, तो हौले से लाल गोटी के कान में सालों से बेजुबान लम्हों को बयां कर देती| वो कहती कि जब शादी के तीन साल हो चुके थे तो वो कितना चाहती थीं सिन्हा जी के साथ आगरा जाना जब वो अपने दोस्तों के साथ जा रहे थे| सिन्हा जी ने बस एक बार ही उनसे पूछा था, वो भी अनमने मन से| और जब उनकी ननद उनको ताने मारती, वो चाहती थीं कि सिन्हा जी अपनी बहन से झगडा करें| झगडा ना भी तो कम से कम गोमती का पक्ष रखें| लेकिन सिन्हा जी अपनी बड़ी बहन के सामने हमेशा मुस्कुरा कर रह जाते| 

सिन्हा जी को गोटी काटने में वो खुशी नहीं मिलती जो उन्हें गोमती के खुश चेहरे को देख कर मिलती है| इंसान कितना अजीब है, वो सोचते| कितनी बड़ी-बड़ी खुशियों की हम उम्मीद करते हैं| वो आती भी हैं, लेकिन कई बार बड़ी खुशियाँ खुशी नहीं देती| वो पल उनको सँभालने में ही निकल जाता है| और लूडो में गोटी काट कर जो खुशी मिलती है, वो कितनी सहज है, कितनी सरल है, अनमोल है, अदभुत है| उनकी गोटी कटती तो वो नाराज़ भी होते| लेकिन वो नाराज़गी कितनी ही खुशियों पर भारी पड़ती| सालों बाद वो खुद को मासूम महसूस कर रहे थे| 

“भक्! फिर आप जीत गयीं| हम समझ रहे हैं आप पासा में कुछ कर देती हैं| बार-बार छक्का कईसे आ जाता है जी?” 

“हाँ| हम जीत जाते हैं तो दुनिया भर का इल्जाम लगा दीजिए| हम कभी गाल नहीं बतियाते हैं| आप गोटी इधर-उधर करते हैं तो भगवान जी सजा देते हैं, और नहीं तो का!” 

“चलिए, एक ठो और गेम खेलते हैं| इ बार एकदम से हरा देंगे आपको|” 

“हाँ, देखते हैं...” कहते-कहते गोमती खाँसने लगी| 

“अरे, दवाई फिर नहीं ली| रुकिए, दवाई लाते हैं| इतना लापरवाह कईसे हो सकती हैं जी?” कहते हुए सिन्हा जी दवाई लेने चले गए| सिन्हा जी थोड़े आलसी किस्म के सरकारी मुलाजिम रहे थे| लेकिन उनका सारा आलसपन गोमती की एक खाँसी में उड़नछु हो जाता, और वो दौड़ जाते उनकी दवाई लेने के लिए| और गोमती खाँसते हुए कहती, “ रुकिए ना, हम ले रहे हैं ना दवा तुरंत| अपना चांस चलिए|” 

“पगला गयी हो एकदम्मे|” कहते हुए सिन्हा जी गोमती को दवा देते| ये सब एक रिवाज़ की तरह कई महीनों से, कई सालों से चल रहा है| 

समय के साथ-साथ दोनों की सेहत भी बिगड़ती जा रही है| लेकिन लूडो उसी उत्साह और जोश के साथ खेलते दोनों| अब ऐसा होता कि हर वक्त लूडो के बोर्ड पर गोटियाँ बिछी होती| सुबह उठकर पहला काम यही होता कि लाल और पीली गोटियों के बीच रेस लगाई जाए| एक मैराथन है जो कई सालों से दोनों खेल रहे हैं| 

सुबह का वक्त है| सिन्हा जी हमेशा गोमती के उठने के बाद ही उठते हैं| गोमती उन्हें दो बातें सुना कर उठाती हैं| आज गोमती ने उन्हें नहीं उठाया| सिन्हा जी ने देखा तो गोमती अब तक सो रही थीं| आठ बज चुके हैं| अब तक तो चाय और लूडो के दो गेम हो चुके होते| सिन्हा जी ने गोमती के बदन को छुआ तो वो जकड़ा हुआ और ठंडा पड़ा था| सिन्हा जी सन्न रह गए| 

अविनाश और स्वाति को फोन करके सबकुछ बताया| 

धीमे क़दमों से जब बैठक में पहुचें तो लूडो के बोर्ड पर लाल और पीली गोटियाँ बिछी देखीं| बोल पड़े, “सुनिए ना, आज आप पहले चांस लीजिए| हम गलथेतरई नहीं करेंगे|” 


29.12.12

www.shabdankan.com पर जून २०, २०१३ को प्रकाशित हुआ| 
लिंक: http://www.shabdankan.com/2013/06/nihal.html